भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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३—ब्रह्मचर्य पर स्वदेशी और विदेशी विद्वान्

( भगवान् शङ्कराचार्य )

में जीवन-पर्यन्त ब्रह्मचारी रह कर भूमण्डल में वेदों का प्रचार करेंगा। मेरी समस्त शक्ति अवैदिकता ( पाखण्ड ) के खण्डन में लगेगी। मुझे विद्यास है कि ब्रह्मचर्य की सहायता से मनुष्य को सब कुछ सुलभ हो सकता है।

प्रिय शिष्यों, आत्म-विजय ही ब्रह्मचर्य का मूल है। ब्रह्मचर्य की अखण्डता से परमात्मा का सहज में लाभ होता है।

(स्वामी रामतीर्थ)

इन्द्रियों के विषय ( भोग-विलास ) में सुख को मत ढूंढें ! हे इन्द्रियों के दास ! अपनी इस सुख की निष्फल और बाहरी खोज को छोड़ दो ! अमरत्व का महासागर तुम्हारे भीतर है। स्वर्ग का राज्य तुम्हारे ही भीतर है। वह सब ब्रह्मचर्य से ही सप्य सकता है।

जैसे दीपक में तेल, वस्ती द्वारा ऊपर को चढ़ता हुआ प्रकाश के रूप में बदल जाता है, वैसे ही वह शक्ति (वीर्य) जिसका कि नीचे की ओर बहाव है, यदि ऊपर की ओर जाये लगे, अर्थात् ऊर्ध्वरेतस (ब्रह्मचारी) बन जाय, तो आकर्षण वाली शक्ति, पूर्ण तेज तथा परमान्दु में बदल सकती है।

हनुमान का नाम लेने और ध्यान करने से लोगों में ह्रदय-

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