ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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होता था कि माया उन पर पूर्ण रूप से अधिकार जमाकर अन नहीं करा सकती थी ।
वास्तव में जब तक हृदय में वैराग्य-भाव जड़ नहीं ज लेता, विषय-वासनायें उसका पीछा छोड़ती ही नहीं । काम, क्रोध और लोभ आदि के घटाने के लिये वैराग्य ही समर्थ हो है । ब्रह्मचर्य का नारा न होने देनेवालों को वैराग्य में अवभाग लेना चाहिये । वैराग्य युक्त मन बनाने के लिये इस प्रकृति विचार करना चाहिये:—
यह संसार ही असाद है । पुराय ही यहाँ सब कुछ है पापियों को नरक भोगना पड़ता है । विषय-भोग में वास्तविक सुख नहीं । अज्ञानता में पड़ कर किसी प्रकार का व्यभिचान करना चाहिये । कोई अमर नहीं होने आया है । जीवन, धन और जीवन थोड़े ही दिनों तक रहते हैं । अतएव इनका अगि मान न करना चाहिये । यह मनुष्य-देह ही अपने स्वार्थ-साधन लिये नहीं मिली है । यह दूसरों की सेवा करने के लिये मिल है । सुस्ने अपने तन, मन, धन आर्यात् सर्वस्व धर्म-सेव देश सेवा के लिये अर्पण कर देना चाहिये ।
(२२) परिश्रम और उत्साह
‘उत्साह वन्तः पुरुषा, नावसीदन्ति कर्हिचित् ।’
( वा० रामायण )
उत्साही पुरुषों को कभी कष्ट नहीं हो सकता ।
परिश्रम और उत्साह में बड़ा धनिष्ठ सम्बन्ध है । परिश्रम और उत्साह से संसार के सारे कार्य सम्पादित होते हैं ।