भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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धोय-रत्ना के सजियम

करना चाहिये और हम विन्यास दिताते हैं कि कुछ ही दिनों में उसका अभ्यास पुष्ट होने ही उसकी विनय होगी और उसकी इन्द्रिय-लौकुपता अवश्य दब जायगी ।

किसी बात का अभ्यास भी धीरे-धीरे करना चाहिये । एकदम करने से हानि होती है और अभ्यास भी छुट जाता है । अभ्यास की ओर सदैव सचेष्ट रहना चाहिये । जो दुर्गुण जान पड़ें, उन्हें छोड़ने और सदुगुणों को ग्रहण करने में भी धीरे-धीरे अभ्यास किया जा सकता है ।

अब हम अभ्यास से होने वाले कुछ गुणों को नीचे लिखते हैं:—

( १ ) अभ्यास से साधना सफल होती है । ( २ ) मनुष्य स्वात्माबलम्भी बन जाता है । ( ३ ) कुछ ही दिनों में सदुगुणों की बुद्धि होती है । ( ४ ) मन में प्रसन्नता होती है तथा ( ५ ) घुरे कार्यों के लिये अवकाश नहीं मिलता ।

(२१) वैराग्य

सर्वं परिग्रहः योग-त्यागः ।

कस्य सुखं न करोति विरागः ।

( शङ्कराचार्य )

सब प्रकार की तृष्णा और भोगों को छोड़ देना इस प्रकार का वैराग्य भला किसे सुख नहीं देता ?

इस देश के प्राचीन निवासी गृहस्थाश्रम में रह कर भी वैरागी होते थे । विदेह जनक ऐसे ही वैरागी थे । इसका फल यह