भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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प्राप्तार्थ-विधान

३३

प्रसन्नता और धीरता रहती है। ( ३ ) कर्तव्य-प्राप्ति में सफल होती है। एवं ( ४ ) स्वस्थता और जीवनी-शक्ति बढ़ती है।

( २० ) सदभ्यास

अतिशय रंगर फरे जो कोई । अनल प्रकट चन्दन ते होई ॥

(रामाय)

‘अभ्यासात्फल ममनुते ।’

अभ्यास के द्वारा कर्तव्य का फल मिलता है।

अभ्यास की श्रेष्ठता शब्दों से कह कर नहीं बतलाई सकती। अभ्यास ही बढ़कर फल के रूप में परिणत हो जा है। जैसे जो विद्यार्थी व्याकरण का आचार्य बनना चाहे, उ व्याकरण का नियमित रूप से अभ्यास करना पड़ता है। या वह पढ़ने का अभ्यास न करे, तो सफल नहीं हो सकता। इसलि जो लोग ब्रह्मचारी बनना चाहें, वे भी वीर्य-रक्षा का अभ्यास करें पहले पहल असफल होने पर भी अभ्यास को न छोड़ना चाहिये केवल मन में ही सोच लेने से काम नहीं चलता। अभ्यास ही उसके साधन को मूल है। जिसकी इन्द्रियलोलुपता बढ़ गई है और उसका छटना कठिन हो गया हो, उसे भी हतारा हो कर बैठ जाना चाहिये। बल्कि उससे छटने के उपायों का निरन्तर अभ्यास

ॐ इस विषय में अधिक जानने के लिये लेखक की ‘ब्रह्म-ज्ञाति नामक पुस्तक देखनी चाहिये।