ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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वीर्य-रत्ना के सन्निधम
अनमोल गुणों को जानते हैं, वे इसको उन्नत करने का अभ्यास भी करते हैं।
प्राचीन समय में इस देश के ऋषि-मुनि इस इच्छा-शक्ति से बहुत कुछ काम लेते थे। इसके चल पर कठोर से कठोर त्रस की साधना में सफल होते थे। अब भी कुछ लोग इच्छा-शक्ति से लाभ उठाते हैं। इसका यह गुण है कि यह विषय प्रेरित की जाती है, उधर ही कार्य कर बैठती है। इसे न जानने वाले लोग अहानवश इससे अनुचित कार्य भी ले लेते हैं। इस प्रकार वह मन्द हो जाती है। अतएव इसे चलवती बनाने का सदुप्यास करना चाहिये। वीर्य-रत्ना के प्रेमी इससे बहुत कुछ लाभ उठा सकते हैं। शान्त चिरा हो कर एकान्त में इसका प्रयोग नित्य करने से बड़ा हित होता है। अपनी इच्छा को खींच कर किसी सत्कार्य के सम्पादन में लगाना चाहिये। ऐसे समय में मन में उसी वस्तु का चिन्तन करना चाहिये। अपने हृदय में या वाणी से कह कर उसकी दृढ़ता निम्नलिखित वाक्यों में करना चाहिये:—
वीर्य-रत्ना में श्रवण्य सफल हो रहा हूँ। यह मेरे लिये कोई कठिन काम नहीं। काम विकारों पर मेरा अधिकार हो गया है। दृष्टा की वास्तव्य मुझे नहीं सता सकती। स्वप्न में भी मेरी इच्छा के विरुद्ध एक विन्दु वीर्य का पतन नहीं हो सकता। मेरा मन सदा-चांग में रम रहा है। कोई ऐसी शक्ति नहीं, जो मुझे धृष्टित कार्यों में फँसा दे दृष्ट्यादि।
इच्छा-शक्ति के प्रयोग से होने वाले कुछ लाभ नीचे लिखे जाते हैं:—
(१) मन अधिकार में हो जाता है। (२) दिन-रात