ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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दीर्घ-रत्ना के सविनयम
(१५) सत्संग
‘सत्संगतिः कथय किञ् करोति पुन्त्ताम् ।’
(सूक्ति)
सज्जानों की संगति पुरुष को क्या नहीं बना सकती ।
‘तातः । स्वर्गं अपूर्णं सुखं, धरिय तुला पक् अंग ।
तुले न ताहि सकल भिलु, जो सुख लव सत संग ॥
(रामायण)
सत्सङ्ग की महिमा प्रायः सभी वेद-पुराणों में गाई और दिखलाई गई है । बड़े बड़े पापी और कुविचारी लोग सत्सङ्ग के प्रभाव से महात्मा और मुक्त हो गये हैं । जैसे लोहा पारस के छूने से सोना बन जाता है, वैसे ही नीच मनुष्य भी सत्सङ्ग पाते ही सुजन हो जाता है ।
सङ्ग का प्रभाव बड़ा ही अदृष्ट होता है । जैसा सङ्ग होता है, वैसा ही भला बुरा उसका प्रभाव भी होता है । कुसङ्ग में पड़ कर बहुत से लोग अपने जीवन को नरकमय बना डालते हैं । इसी लिये गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है :—
चक्र भल चास नरक कर ताता । दुष्ट संग जनि देह विघाता ॥
कुसङ्ग में पड़ कर अपने को सदाचारी और संयमी बनाये रखना लोहे के चना चवाने के समान है । अच्छे से अच्छे पुरुष को भी इस बात का अभिमान न करना चाहिए कि वह खलों की भण्डली में घुस कर अपना धर्म निशा सकेगा । क्योंकि ऐसा करना विपत्तन कर जीवित रहने की आशा करने की भाँति है । अतः एव जो लोग दीर्घ-रत्ना के प्रेमी हों, वे सदैव कुसङ्ग से दूर रहें ।
अब हम कुछ सत्सङ्ग के लाभों को नीचे लिखते हैं :—