भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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महाचर्य-विज्ञान

( १ ) सत्सङ्ग से मन का अविवेक छूट जाता है, और स बुद्धि का उदय होता है । ( २ ) शारीरिक और मानसिक ऊर्जा की शिक्षा मिलती रहती है । ( ३ ) सांसारिक प्रपञ्चों से जी-सुक हो जाता है । ( ४ ) भगवद्भक्ति, कृतज्ञता और परीपक्वा-के भाव दृढ़ हो जाते हैं । ( ५ ) भोग-बिलास की निःसारता प्र-हो जाती है ।

( १६ ) सद्गुणग्रन्थों का पाठ

सद्गुणग्रन्थवाचन परो भव पित्त नित्यम् ।

हे मित्र ! अच्छे ग्रन्थों के पढ़नेवाले बनो ! ( सृष्टि

यथास्ति सद्गुणग्रन्थ विमर्शे भाग्यं ।

किं तस्य शुक्लैश्वरपला चिन्तोदः । ( सृष्टि

जिसके भाग्य में उन्मादोत्तम ग्रन्थों का अनुशीलन करना व है, उसके लिये लक्ष्मी के छुप्क विनोद किस काम के ।

सद्गुणग्रन्थ मनुष्य के सब-से श्रेष्ठ मित्र हैं । ये ऐसे मित्र कि प्रत्येक समय में हृदय को शान्ति प्रदान करते हैं । आज त जितने महात्मा हुए हैं, प्रायः सब पर इतका प्रभाव पड़ा है । इन के कारण ज्ञान का कोष संसार में सुरक्षित है । जिसने इनकी अ राधना की उसे कुछ न कुछ अवश्य मिला ।

वास्तव में सद्गुणग्रन्थों की सहिमा अपार है । यही कारण कि कवि, तत्ववेत्ता, विरक्त, योगी, साधु, भक्त तथा अनुरक्त लो