ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
महाचर्य-विज्ञान
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( १ ) सत्सङ्ग से मन का अविवेक छूट जाता है, और स बुद्धि का उदय होता है । ( २ ) शारीरिक और मानसिक ऊर्जा की शिक्षा मिलती रहती है । ( ३ ) सांसारिक प्रपञ्चों से जी-सुक हो जाता है । ( ४ ) भगवद्भक्ति, कृतज्ञता और परीपक्वा-के भाव दृढ़ हो जाते हैं । ( ५ ) भोग-बिलास की निःसारता प्र-हो जाती है ।
( १६ ) सद्गुणग्रन्थों का पाठ
सद्गुणग्रन्थवाचन परो भव पित्त नित्यम् ।
हे मित्र ! अच्छे ग्रन्थों के पढ़नेवाले बनो ! ( सृष्टि
यथास्ति सद्गुणग्रन्थ विमर्शे भाग्यं ।
किं तस्य शुक्लैश्वरपला चिन्तोदः । ( सृष्टि
जिसके भाग्य में उन्मादोत्तम ग्रन्थों का अनुशीलन करना व है, उसके लिये लक्ष्मी के छुप्क विनोद किस काम के ।
सद्गुणग्रन्थ मनुष्य के सब-से श्रेष्ठ मित्र हैं । ये ऐसे मित्र कि प्रत्येक समय में हृदय को शान्ति प्रदान करते हैं । आज त जितने महात्मा हुए हैं, प्रायः सब पर इतका प्रभाव पड़ा है । इन के कारण ज्ञान का कोष संसार में सुरक्षित है । जिसने इनकी अ राधना की उसे कुछ न कुछ अवश्य मिला ।
वास्तव में सद्गुणग्रन्थों की सहिमा अपार है । यही कारण कि कवि, तत्ववेत्ता, विरक्त, योगी, साधु, भक्त तथा अनुरक्त लो
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वीर्य-रत्ना के सन्निधम
इनको पढ़ कर अभीष्ट फल प्राप्त करते हैं । इनका संग्रह धन के संग्रह से भी कहीं बढ़कर होता है । मनुष्य-जाति इन्हों की सहायता से सर्वोन्नति कर सकता है । कुविचारियों के भी विचार गढ़ पलट जाते हैं ।
• आजकल अश्लील तथा लज्जाजनक उपन्यासों के प्रचार से समाज की बड़ी दुर्गति हो रही है । विचारियों के दुराचारी होने का बहुत कुछ कलङ्क इनके सिर पर भी लगाया जा सकता है । घुरे साहित्य के प्रचार से समाज में दुराचार तथा न्यमिचार की वृद्धि होती है । इन घुरे ग्रन्थों से ब्रह्मचर्य का अधिक रूप से हास हो रहा है ।
अतः जो लोग वीर्य-रत्ना करना चाहें, वे घुरे ग्रन्थों से अवश्य बचें । और अपने अवकाश के समय में सदाचार, नीति, धर्म, जीवनचरित्र तथा गन्धीर विषयों के, जैसे रामायण, गीता, योग वाशिष्ठ, मनुस्मृति, दर्शन-शास्त्र तथा स्त्रा० विवेकानन्द, श्रृ० द्या-नन्द, स्त्रा० रामतीर्थ, रामकृष्ण परमहंस, तुकारामजी आदि के उत्तमोत्तम ग्रन्थों के पढ़ने में मन लगावें । पढ़ने का क्रम नित्य होना बहुत ही उपदेय होता है ।
(१) सद्ग्रन्थों के निरन्तर पाठ से कर्मनिष्ठा, प्रसन्नता, भीरता, सेवा-शक्ति, दया और गुणमाहकता की वृद्धि होती है ।
(२) चिन्ता, भय, पराधीनता, द्वेष तथा अहङ्कार से रक्षा होती है ।
(३) मन और मस्तिष्क को दृढ़ता और शान्ति मिलती है ।
तथा (४) मनुष्य व्यथोगी और परिश्रमी बन जाता है ।
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ग्रन्थस्ये-विज्ञान
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(१७) नियम-बद्धता
मनुष्य-जीवन को सुख और शान्तिमय बनाने में नियम-बद्ध का बहुत बड़ा हाथ होता है। जो लोग नियम से अपने फाम कर वाले नहीं होते, वे कभी उच्च और आदर्श पुरुष नहीं बन सकते। भारतवर्ष में और विरोध कर हिन्दू-जाति में अब नियम बद्धता को बहुत कम महत्व दिया जा रहा है। यहाँ की अपेक्षा पाश्चात्य देशवासी बहुत ही नियम-बद्ध होते हैं। यही कारण। कि वे विरोध करके स्वस्थ, उद्योगी, साहसी, मेधावी और हा प्रतिष्ठ होते हैं। अनियमित पुरुष कभी किसी कार्य में पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सकता। अतः वीर्य-रक्षा के प्रेमियों को चाहिं कि नियम-बद्ध होने का सब से पहले उद्योग करें।
जैसा कुछ नियम बनाया गया हो, उसे उचित समय पर व्यवहार में लाने का नाम 'नियम-बद्धता' है। प्रत्येक मनुष्य को चाहिये कि वह अपनी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा के लिए कुछ न कुछ विचार-पूर्ण उपयोगी नियम बना ले और फिर उनके अनुसार चलने का पूरा प्रयत्न करे।
(१) नियम-बद्धता से मनुष्य अपनी सब प्रकार की ऊर्जा कर सकता है। अपने अंगीकृत कामों को पूरा कर सकता है।
(२) उद्योग-शीलता, कर्तव्यपरायणता, दृढ़ता और कार्य-कारित में मन लगता है। (३) विद्या और चत का संग्रह किया जा सकता है। और (४) विषय-भोगों की ओर चित्त नहीं दीढ़ता।
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वीर्य-रत्ना के सन्निधम्
(१८) शिव-सङ्कल्प
‘हमृतिष्टां अजिर्न जविष्टां तन्मैमनः शिव सङ्कल्पमस्तु ।
( यजुर्वेद )
‘सर्वे सङ्कल्पजाः स्मृताः ।’
( भगवत्सुति )
सभी उत्तमोत्तम कार्य सङ्कल्प से ही होते हैं ।
सङ्कल्पेन विना राजन्, यत्किञ्चित्कुरुते नष्टः ।
फलस्याल्पाल्पकं तस्य, धर्मस्याध्वन्यं भवेत् ॥
( पद्मपुराण )
हे राजन् ! सङ्कल्प के विना जो कृष्ट किया जाता है, उसका फल बहुत कम होता है, और उसके धर्म का आधा भाग नष्ट हो जाता है ।
हिन्दू-धर्म में प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ करने में सङ्कल्प करना पड़ता है । इस कृत्य में बहुत बड़ा तत्त्व छिपा हुआ है । सङ्कल्प-हीन कार्यों की पूर्ति में सन्देह रहता है । वीर्य-रत्नाजी भी एक प्रकार का व्रत है । जिसमें दृढ़ सङ्कल्प नहीं, वह इसमें कभी सफल नहीं हो सकता । सङ्कल्प के अनुसार ही शुभाशुभ कार्य भी होता है । इसलिये सदैव अपने सङ्कल्प को शुभ रखना चाहिये ।
सङ्कल्प इस प्रकार का होना चाहिये :—
मैं आज से ब्रह्मचर्य ( वीर्य-रत्ना ) में दत्तविद्या रहूँगा । न्यमिचार से सदैव घृणा करता रहूँगा । मैं पर-की पर कुट्टि न डालूँगा । मैं अपनी पत्नी से ही सन्तुष्ट रहूँगा । मैं अपनी मानसिक और शारीरिक उन्नति करूँगा । मैं परमात्मा और धर्म को छोड़कर किसी से न डरूँगा इत्यादि ।
प्राप्त्यर्थ-विज्ञान
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अब हम शुभ सङ्कल्प से होने वाले कतिपय लाभों को नीचे लिखते हैं:—
( १ ) शुभ सङ्कल्प से कार्य के करने में असफलता का भय नहीं रहता । ( २ ) मन को दृढ़ता प्राप्त होती है । ( ३ ) वाधाओं के सहने की शक्ति प्राप्त होती है । ( ४ ) कर्तव्य से विमुख होने की इच्छा नहीं होती । ( ५ ) स्वाधीन विचार जागृत हो जाते हैं ।
( १६ ) इच्छा-शक्ति-प्रयोग
आकृति देवीं सुभगां पुरो दधे । चिन्तस्य माता सुवह्ना ना श्रुतु ॥
( अथर्ववेद )
हम इच्छा-शक्ति देवी की उपासना करते हैं । वह चित्त की माता है । अतः हमारे लिये सुखदायिनी धने !
“अकामस्य क्रिया काचिद्, दश्यते नेह कर्हिचित् ।”
( मनुष्यसूति )
मनः कामना के बिना इस संसार में कोई कार्य नहीं हो सकता ।
‘या दगिच्छेच्छ भवितु, तादृगभवति पुरुषः ।’
( म० विदुर )
पुरुष जैसा होने की इच्छा करता है, वैसा बनता है ।
इच्छा-शक्ति का नाम विद्यान् लोगों ने सुना ही होगा ? मनुष्य के भीतर यह दैवी-विभूति छिपी हुई है । जो लोग इसके
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वीर्य-रत्ना के सन्निधम
अनमोल गुणों को जानते हैं, वे इसको उन्नत करने का अभ्यास भी करते हैं।
प्राचीन समय में इस देश के ऋषि-मुनि इस इच्छा-शक्ति से बहुत कुछ काम लेते थे। इसके चल पर कठोर से कठोर त्रस की साधना में सफल होते थे। अब भी कुछ लोग इच्छा-शक्ति से लाभ उठाते हैं। इसका यह गुण है कि यह विषय प्रेरित की जाती है, उधर ही कार्य कर बैठती है। इसे न जानने वाले लोग अहानवश इससे अनुचित कार्य भी ले लेते हैं। इस प्रकार वह मन्द हो जाती है। अतएव इसे चलवती बनाने का सदुप्यास करना चाहिये। वीर्य-रत्ना के प्रेमी इससे बहुत कुछ लाभ उठा सकते हैं। शान्त चिरा हो कर एकान्त में इसका प्रयोग नित्य करने से बड़ा हित होता है। अपनी इच्छा को खींच कर किसी सत्कार्य के सम्पादन में लगाना चाहिये। ऐसे समय में मन में उसी वस्तु का चिन्तन करना चाहिये। अपने हृदय में या वाणी से कह कर उसकी दृढ़ता निम्नलिखित वाक्यों में करना चाहिये:—
वीर्य-रत्ना में श्रवण्य सफल हो रहा हूँ। यह मेरे लिये कोई कठिन काम नहीं। काम विकारों पर मेरा अधिकार हो गया है। दृष्टा की वास्तव्य मुझे नहीं सता सकती। स्वप्न में भी मेरी इच्छा के विरुद्ध एक विन्दु वीर्य का पतन नहीं हो सकता। मेरा मन सदा-चांग में रम रहा है। कोई ऐसी शक्ति नहीं, जो मुझे धृष्टित कार्यों में फँसा दे दृष्ट्यादि।
इच्छा-शक्ति के प्रयोग से होने वाले कुछ लाभ नीचे लिखे जाते हैं:—
(१) मन अधिकार में हो जाता है। (२) दिन-रात
प्राप्तार्थ-विधान
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प्रसन्नता और धीरता रहती है। ( ३ ) कर्तव्य-प्राप्ति में सफल होती है। एवं ( ४ ) स्वस्थता और जीवनी-शक्ति बढ़ती है।
( २० ) सदभ्यास
अतिशय रंगर फरे जो कोई । अनल प्रकट चन्दन ते होई ॥
(रामाय)
‘अभ्यासात्फल ममनुते ।’
अभ्यास के द्वारा कर्तव्य का फल मिलता है।
अभ्यास की श्रेष्ठता शब्दों से कह कर नहीं बतलाई सकती। अभ्यास ही बढ़कर फल के रूप में परिणत हो जा है। जैसे जो विद्यार्थी व्याकरण का आचार्य बनना चाहे, उ व्याकरण का नियमित रूप से अभ्यास करना पड़ता है। या वह पढ़ने का अभ्यास न करे, तो सफल नहीं हो सकता। इसलि जो लोग ब्रह्मचारी बनना चाहें, वे भी वीर्य-रक्षा का अभ्यास करें पहले पहल असफल होने पर भी अभ्यास को न छोड़ना चाहिये केवल मन में ही सोच लेने से काम नहीं चलता। अभ्यास ही उसके साधन को मूल है। जिसकी इन्द्रियलोलुपता बढ़ गई है और उसका छटना कठिन हो गया हो, उसे भी हतारा हो कर बैठ जाना चाहिये। बल्कि उससे छटने के उपायों का निरन्तर अभ्यास
ॐ इस विषय में अधिक जानने के लिये लेखक की ‘ब्रह्म-ज्ञाति नामक पुस्तक देखनी चाहिये।
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धोय-रत्ना के सजियम
करना चाहिये और हम विन्यास दिताते हैं कि कुछ ही दिनों में उसका अभ्यास पुष्ट होने ही उसकी विनय होगी और उसकी इन्द्रिय-लौकुपता अवश्य दब जायगी ।
किसी बात का अभ्यास भी धीरे-धीरे करना चाहिये । एकदम करने से हानि होती है और अभ्यास भी छुट जाता है । अभ्यास की ओर सदैव सचेष्ट रहना चाहिये । जो दुर्गुण जान पड़ें, उन्हें छोड़ने और सदुगुणों को ग्रहण करने में भी धीरे-धीरे अभ्यास किया जा सकता है ।
अब हम अभ्यास से होने वाले कुछ गुणों को नीचे लिखते हैं:—
( १ ) अभ्यास से साधना सफल होती है । ( २ ) मनुष्य स्वात्माबलम्भी बन जाता है । ( ३ ) कुछ ही दिनों में सदुगुणों की बुद्धि होती है । ( ४ ) मन में प्रसन्नता होती है तथा ( ५ ) घुरे कार्यों के लिये अवकाश नहीं मिलता ।
(२१) वैराग्य
सर्वं परिग्रहः योग-त्यागः ।
कस्य सुखं न करोति विरागः ।
( शङ्कराचार्य )
सब प्रकार की तृष्णा और भोगों को छोड़ देना इस प्रकार का वैराग्य भला किसे सुख नहीं देता ?
इस देश के प्राचीन निवासी गृहस्थाश्रम में रह कर भी वैरागी होते थे । विदेह जनक ऐसे ही वैरागी थे । इसका फल यह
दृष्टान्तचर्य-विज्ञान
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होता था कि माया उन पर पूर्ण रूप से अधिकार जमाकर अन नहीं करा सकती थी ।
वास्तव में जब तक हृदय में वैराग्य-भाव जड़ नहीं ज लेता, विषय-वासनायें उसका पीछा छोड़ती ही नहीं । काम, क्रोध और लोभ आदि के घटाने के लिये वैराग्य ही समर्थ हो है । ब्रह्मचर्य का नारा न होने देनेवालों को वैराग्य में अवभाग लेना चाहिये । वैराग्य युक्त मन बनाने के लिये इस प्रकृति विचार करना चाहिये:—
यह संसार ही असाद है । पुराय ही यहाँ सब कुछ है पापियों को नरक भोगना पड़ता है । विषय-भोग में वास्तविक सुख नहीं । अज्ञानता में पड़ कर किसी प्रकार का व्यभिचान करना चाहिये । कोई अमर नहीं होने आया है । जीवन, धन और जीवन थोड़े ही दिनों तक रहते हैं । अतएव इनका अगि मान न करना चाहिये । यह मनुष्य-देह ही अपने स्वार्थ-साधन लिये नहीं मिली है । यह दूसरों की सेवा करने के लिये मिल है । सुस्ने अपने तन, मन, धन आर्यात् सर्वस्व धर्म-सेव देश सेवा के लिये अर्पण कर देना चाहिये ।
(२२) परिश्रम और उत्साह
‘उत्साह वन्तः पुरुषा, नावसीदन्ति कर्हिचित् ।’
( वा० रामायण )
उत्साही पुरुषों को कभी कष्ट नहीं हो सकता ।
परिश्रम और उत्साह में बड़ा धनिष्ठ सम्बन्ध है । परिश्रम और उत्साह से संसार के सारे कार्य सम्पादित होते हैं ।
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वीर्य-रत्ना के सन्निधम
दिन-रात परिश्रम में लगे रहने से विषय-वासनायें नहीं सवार्यो। निरुद्यमी लोगों को ही विलासिता में आनन्द मिलता है। उत्साही पुरुष कभी आलसी होकर नहीं बैठ सकता। उसका मन सदैव ऊँचे से ऊँचे कार्य के सञ्चालन में लगा रहता है। इसलिये उसे भोग-विलास की बातों में पड़ने का अवसर ही नहीं मिलता। जो लोग अपने वीर्य की रक्षा करना चाहते हैं, उन्हें कभी निरुद्यमी और अनुत्साही धन कर न रहना चाहिये। क्योंकि आलस्य-ही शैवान का घर है। निरुद्यमी रहने से सदा कुविचार उत्पन्न होने रहते हैं। अतएव सब लोगों को परिश्रमी और उत्साही बनने का प्रयत्न करना चाहिये।
( २३ ) सन्ध्वी श्रद्धा
‘यो यच्छद्धः स एव सः।’
(भगवद्गीता)
जो जैसी श्रद्धा रखता है, वह वैसा ही बनता है।
बिना सन्ध्वी श्रद्धा के मनुष्य किसी भी कार्य को सुचारुता से नहीं कर सकता। अश्रद्धा होने से कर्तव्य-पालन में मन ही नहीं लगता और उसके कार्य में भी सफलता नहीं मिलती।
वीर्य-रत्ना के लिये भी सन्ध्वी श्रद्धा की आवश्यकता होती है। जो पुरुष श्रद्धाचार्य के प्रति अपने हृदय में सन्ध्वी श्रद्धा नहीं रखता, वह कभी संयम नहीं कर सकता। श्रद्धालु पुरुष ही इस पच्छद व्रत का पालन कर सकता है। इसलिये जो लोग वीर्य-
प्रश्नोत्तर-विज्ञान
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रक्क बनना चाहते हैं, उन्हें चाहिये कि पहले पहल उसके श्रद्धालु बनें।
सच्ची श्रद्धा से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—
(१) सच्ची श्रद्धा से कोई भी कार्य सरलता से सिद्ध जाता है। (२) मन में उत्साह रहता है। (३) प्रसन्नता उत्पन्न रहती है। (४) दुर्गुणों का नाश होता है। और (५) प्रकार के सुधार और आत्म-संयम हो सकते हैं।
(२४) दृढ़ विश्वास
'विश्वासः फल दायकः।'
(सि)
विश्वास फल का देने वाला होता है।
विश्वास के बिना प्रत्येक कार्य के करने में भय प्रतीत हो है। और भय के हो जाने से उसकी पूर्ति के लिये उचित उद्ये नहीं होता। अविश्वास के कारण हमने कई लोगों को साधारण साधारण कार्य में असफल होते देखा है, और कठिन से कठिन कार्य में भी अपने विश्वास के कारण लोग सफल हुये हैं। धी रचा के लिये भी दृढ़ विश्वास की नितान्त आवश्यकता होती है इस बात का प्रति समझ विश्वास रखना चाहिये कि हम अवश्य इस व्रत में सफल होंगे। फिर किसी भाँति का भय नहीं सकता। कष्टों के पड़ने पर भी विश्वास को दृढ़ रखना चाहिये दृढ़ विश्वास से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—
(१) दृढ़ विश्वास से कार्य-साधन में सफलता मिलती है।
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वीर्य-रत्ना के सजियम
॥(२) हृदय में स्वाभाविक शान्ति रहती है। (३) मनुष्य धरत्ता से कार्यों में लगा रहता है। (४) उद्योग में कमी नहीं होती। एवं (५) सद्चित्तों की उत्पत्ति होती है।
(२५) विश्व-प्रेम
‘उदार चरितानांतु, वसुधैव कुटुम्बकम् ।’
जो उदार चरित्र वाले पुरुष हैं, वे संसार को अपना कुटुम्बी मानते हैं।
विश्व-प्रेम बड़ी है, जिसमें कि अपने-परारेषण का भेद-भाव नहीं रह जाता। ऐसे प्रेमी का हृदय शुद्ध और सरल हो जाता है। उसके विचार श्रेष्ठ और पवित्र हो जाते हैं। इसी से वह संसार के स्त्री-पुरुषों को अपना कुटुम्बी समझता है। ऐसा कदाचित् ही कोई नीच मनुष्य हो, जो अपने कुटुम्बियों के प्रति दुर्भाव रखता हो और उनका अहित चाहता हो ! विश्व-प्रेमी के हृदय में अन्य किसी स्त्री पर कुछि फेरने का विकार ही नहीं उठ सकता। वह तो अधम और अन्यायियों को भी सदाचारी और चरित्रवान् तथा कुलदा और दयभिवारिणी को साध्वी और सदाचारिणी बनाने का प्रयत्न करता रहता है। वह सुख और शान्ति के लिये वायु-मण्डल को ही प्रक्षपयैमय देखना चाहता है। उसके विश्व-प्रेम का यह अन्तिम ध्येय होता है। फिर ऐसा पुरुष वीर्य-रत्ना में अपने को निश्चाय रूप से समर्थ बना सकता है।
अतएव ऐसी उद्वभावना सदा मन में रखनी चाहिये।
ऋग्वेद-विज्ञान
( २६ ) खड़ाऊ पहनना
वीर्य-रत्ना के लिये खड़ाऊ पहनना बड़ा श्रेयस्कर सिद्ध है। यही कारण है कि ऋग्वेद की दीक्षा के समय बालक पाहुका ( खड़ाऊ) पहना दो जाती है। बहुत से सन्थासिय भी हमने सदा खड़ाऊ पहनते हुये देखा है। खड़ाऊ काठ की होती है। इसकी पवित्रता में तो कोई सन्देह ही नहीं। पिंदिन-रात में आवश्यकता पड़ने पर जल से धोई भी जा सकता है। ये दोनों पैरों में पहनी जाती हैं और इनकी दोनों हैं दोनों अंगुठों की मोटी नसों को दबाती हैं। इन नसों और जननेन्द्रिय का बड़ा भारी सम्बन्ध है। इनकी दाब से इंद्रिय में व्यर्थ और असमय में उठने वाली उत्तेजना दबती है। इनका प्रभाव मस्तिष्क तक पड़ता है। इसलिये काम-ग्री भी वाधा नहीं पहुँचाने पाते। पाहुका के गुणों को इसके अर्थ स्वयं जान सकते हैं।
नित्य की पहनने वाली पाहुकायें पुष्ट लकड़ी की घनी हलकी होती चाहिये। उनकी खूंटियाँ गोल, बड़ी और नीचे ढ़िदार रहें। इसके विरुद्ध रहने से आँखों को हानि पहुँचती है जूते की अपेक्षा खड़ाऊ के पहनने में विशेष सरलता सुविधा होती है। खर्च भी कम पड़ता है। धर्म की रत्ना है। जूते पहननेवालों के पैरों में बड़ी वद्वृद्धि होती है और इसलिये नाना प्रकार के रोग उससे शरीर में पैदा हो जाते ऋग्वेद-पालन करने वालों के लिये पाहुका-धारण बहुत होला है। इस सम्बन्ध में हमारा स्वयं भी ऐसा ही अनुभव है।
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वीर्य-रक्षा के सन्निधमः
पादुका-धारण से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—
(१) इससे अण्ड-बुद्धि नहीं होती और जननेन्द्रिय में अनावश्यक उत्तेजना नहीं उठती। (२) मन शान्त और अधिकार में रहता है। (३) बुद्धि और शक्ति की बुद्धि होती है। तथा (४) विषय-शक्ति और दुर्गति घट जाती है।
(२७) सूर्यताप-क्षेचन
'सूर्य आत्मा जगत्तत्संश्रुष्यसि'
(यजुर्वेद)
चराचर प्राणी और समस्त पदार्थों का आत्मा और प्रकाशक होने से परमेश्वर का नाम 'सूर्य' है।
सूर्य भगवान से संसार का कितना बड़ा उपकार होता है, यह कहने की आवश्यकता नहीं। बड़े बड़े विज्ञान-वेत्ताओं ने यह स्वीकार किया है कि यदि सूर्य न रहे, तो सर्वत्र अन्धकार हो जायगा और सारे मनुष्य, पशु, पक्षी तथा वृक्ष-वृक्षरुद्ध सूर्यो के मारे जीवित न बचेंगे। यह बात वास्तव में ठीक है। वेदों में भी सूर्य की बड़ी प्रशंसा की गई है।
सूर्य का प्रभाव मनुष्य के शरीर पर बहुत गहरा पड़ता है। चिकित्सकों का मत है कि सूर्य की किरणों के सेवन से प्रत्येक प्रकार के रोग शान्त किये जा सकते हैं
वीर्य-रक्षा के लिये भी सूर्य-किरणों बहुत उपयोगी हैं। अधिक से अधिक एक घण्टा मित्य सूर्य-किरणों के सेवन से बड़ा लाभ हो सकता है।
श्रद्धाचर्य-विधान
सब कपड़े खोल कर सूर्य की ओर मुख कर बैठ चाहिये और फिर यह मन में सोचना चाहिये कि सूर्य कं किरणों, जो मेरे शरीर पर पड़ रही हैं, मेरे वीर्य को पुष्ट शुद्ध बना रही हैं। सारे शरीर में नया जीवन भर रहा है। : के घुरे परमाणु नष्ट हो रहे हैं इत्यादि। इस प्रकार कुछ दिन अभ्यास करने से श्रद्धाचर्य के पालन में अच्छी सहायता मिलत सूर्य ताप-सेवन से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—
( १ ) सूर्य-ताप सेवन से जीवनी-शक्ति बढ़ती है। ( सर्वाङ्ग के रोग दूर होते हैं। ) ( ३ ) मानसिक शक्तियाँ बढ़ती हैं। साधना की बुद्धि होती है। तथा ( ५ ) कान्ति, तेजस्विता धीरता बढ़ती है।
(२८) सामाजिक शयन
निद्रा तु सेविता काले, धातुसाम्यमतनिन्द्रताम् । पुष्टिं धर्णं बलान्साहं वहिर्दक्षिति करोतिहि ॥
रात में ठीक समय पर सोने से धातु ठीक अवस्था में र है और घुस्ती भी दूर होती है। पुष्टि, कान्ति, बल और वत्साह बढ़ता है तथा अग्नि भी हीम होती है।
दिन भर काम करने के पश्चात् रात में शान्तिपूर्वक से चाहिये। स्वास्थ्य के लिये यह भी एक आवश्यक कार्य है सोने से कई प्रकार के हानिकारक रोग वत्सन्न हो जाते हैं। जैसे अजीर्ण, षडास्तीनता, आलस्य, ववर, स्वप्नदोष, वायुविष
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वीर्य रक्षा के सलियम
वन्माद तथा बुद्धि-भ्रंश इत्यादि । इसलिये प्रत्येक मनुष्य को कम से कम छः घण्टे तक तो अवश्य सोना चाहिये ।
कुछ लोग अधिक रात तक सोते हैं और सूर्य उग जाने के उपरान्त भी सोते रहते हैं । कुछ ऐसे भी हैं जो रात में जागते और दिन में सोते हैं । ऐसे लोग कदापि वीर्य-रक्षा में सफल नहीं हो सकते । सोने का प्रभाव हमारे सब अङ्गों की नस नस पर पड़ता है । समय पर न सो जाने से सब को बड़ी चूति पहुँचती है । रक्त में उष्णता उत्पन्न हो जाने से वीर्य बिगड़ कर किसी न किसी रूप में बाहर निकल जाता है ।
बहुत से विद्यार्थी ऐसे हैं जो अधिक रात तक जाग कर पढ़ते हैं, इससे वे प्रायः अस्वस्थ रहते हैं । स्नानदोष उनके पीछे लग जाता है । कौष्ठ-बद्धता के कारण मल-मूत्र त्यागने में जोर देने से उनका वीर्य बाहर निकल जाता है । ऐसे कई विद्यार्थियों को हमने सामयिक शयन से नीरोग किया है । इसलिये ब्रह्मचर्य रखने वालों को भी हम यही सम्मति देते हैं कि १० बजे रात तक अवश्य सो जाया करे, ताकि प्रातःकाल ४ बजे वे उठ सकें ।
सामयिक शयन से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—
(१) सामयिक शयन से सारा श्रम दूर हो जाता है । (२) पुनः कार्य करने की नवीन शक्ति प्राप्त होती है । (३) आयुर्वेद कहता है । (४) स्नानदोष, धातुदोषैक्य, शिरःदोष, आलस्य, अरुणमूत्र और रक्त-विकार आदि से रक्षा होती है । (५) नेत्रों और हृदय को विश्राम मिल जाता है ।
अध्यात्म-विज्ञान
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( २६ ) शुभ दर्शन
दर्शन का बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध मरित्तक के साथ है। की शक्ति का केन्द्र हमारे मरित्तक में है। इसलिये जो कुछ दे हैं, उसका प्रभाव चिरस्थायी हो जाता है। यह मानस-शास्त्र नियम है।
हमारे हिन्दू-धर्म में दर्शन का बड़ा महत्व माना गया। ऐसा विरला ही कोई हो जो किसी न किसी देवी-देवता के दृष्टि मिलने पर न करता हो। भगवान् के दर्शन करने से पवित्र होता है। दर्शन के समय हमको भगवान् के चरित्र स्मरण कर उनके गुणों का अनुकरण करने की भावना करनी चाहिये और अपने चरित्र के दोषों पर विचार का चाहिये।
इसी प्रकार सबे बैरागी महात्मा, तथा ऋषि लोगों के दर्शन भी लाभ होता है। निरन्तर के अभ्यास से जब एक प्रवृत्ति हृदय में बैठ जायगी तो फिर दूसरी वृत्ति भावना-मूर्ति अपना स्थान न जमा सकेगी।
शुभ दर्शनों से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—
( १ ) प्रेम, सदाचार, सौजन्य, भक्ति-भाव और सहिष्णु की वृद्धि होती है। ( २ ) चिन्ता और ग्लानि दूर होती है। ( ३ ) कुकर्मों में चित्त नहीं दीखता। ( ४ ) धर्म में उत्साह बढ़ता है। ( ५ ) हृदय में सदा शुद्ध भावनाएँ जागृत रहती हैं।
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(२०) दैनिक व्यायाम
शरीरोपचयः कान्तिं गार्गार्णं सुविभक्तता । दीप्तान्तिवधमनालस्यं, स्थिरत्वं लाघवश्रद्धा ॥ श्रमकूलमिपासोऽप्य शीताशीनां सहिष्णुता । आरोग्यशब्दादि परमं, व्यायामादुपजायते ॥
( श्रुतुव-संहिता)
व्यायाम करने से शरीर की कान्ति बढ़ती है, सब अङ्गों का गठन भला मालूम होता है। अग्नि-दीप्तता, निरालस्य, स्थिरता, स्फूर्ति, निरोगिता, परिश्रम, यकावट, सर्दी और गर्मी आदि के सहने की शक्ति और उत्तम आरोग्य प्राप्त होता है।
इस देश में व्यायाम के महत्व से प्रायः लोग परिचित हैं। प्राचीन समय में हिन्दू-जाति इससे बहुत लाभ उठा चुकी है। अभी भी बहुत से लोग किसी न किसी प्रकार के व्यायाम के अभ्यासी देखे जाते हैं। शरीर के लिये व्यायाम अश्वत् रूप है और यही सब कर्मों का साधन है। व्यायाम से ही दुर्बलेन्द्रिय भी वलवान हो जाते हैं।
व्यायाम के श्वाजकल अनेक प्रकार हैं। पर देशी व्यायाम उत्तम है, जैसे डेंडू, वैठक, दौड़ और मिह्न्त आदि। व्यायाम वीर्य-रक्षा का भी परमोत्तम साधन है। जो वीर्य-रक्षक नहीं है, वह कभी व्यायाम में सफल नहीं हो सकता। लड़ने-मिह्ने वाले लोग अपने वीर्य पर संयम रखते हैं। नियम-पूर्वक एक वर्षतक किसी प्रकार का व्यायाम करते रहने से शरीर सुदृढ़ और सुन्दर
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मूलचर्य-विधान
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वन जाता है। मूलचर्य का पालन करनेवाले के लिये व्याप बड़ा ही उपयोगी होता है।
व्यायाम दो बार किया जा सकता है। यदि न हो सके, एक बार सबेरे तो अवश्य ही करना चाहिये। व्यायाम के पश्च योड़ी देर ठहर कर कुछ जलपान कर लेना चाहिये।
(१) दैनिक व्यायाम से मन शान्त और सदा प्रसन्न रह है। (२) कठिन से कठिन कार्य सरल प्राप्त होते हैं। (३) इन्द्र के दमन की शक्ति मिलती है। (४) विषय-भोगों में निर्लिप्त होती है। तथा (५) अनेक शारीरिक और मानसिक दुःख दूर होते हैं।
(३१) आसनों का अभ्यास
योग-शास्त्र में आसन भी योग का एक अङ्ग माना गया है इसे एक प्रकार का व्यायाम भी कह सकते हैं। शरीर के लिये यह अत्यन्त उपयोगी है ही, पर इससे मानसिक लाभ भी बढ़ होता है। जब तक आसन स्थिर नहीं होता, मन की चञ्चलता जा नहीं। अनस्थिरता के कारण भी मन में विषय-वासनायें जाग ही उठती हैं। कुछ आसन ऐसे हैं, जिनसे वीर्य-रक्षा तथा इन्द्र दमन में बड़ी सहायता मिलती है। यही कारण है कि योगी-लं आसन के प्रायः अभ्यासी होते हैं।
सीधे बैठना, सीधे चलना आदि भी आसनों के अङ्ग हैं, आजकल हम देखते हैं प्रायः लोग इस ओर ध्यान ही नहीं देते इससे उनको स्नायविक व्यास-प्रत्यास-क्रिया ( जो शरीर
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जीर्ण-न्दा के सन्निधम
नीरोग रखने के लिये घड़ी आवश्यक है ) वचित रूप से नहीं होती । इससे जीवन्ती-शक्ति घटती और रोग बढ़ता है ।
हमारे विचार से आसनों में 'सिद्धान्त' सब साधारण के लिये न्यत्यन्त उपयोगी है । इससे किसी प्रकार की किसी को हानि नहीं हो सकती । यह सरल भी है । इसकी अपेक्षा दूसरे आसन क्रिष्टसाध्य तथा देश, काल और वल का विचार रख कर किये जा सकते हैं । उनमें जरा भी त्रुटि होने से शारीरिक तथा मानसिक हानि होने की भी सम्भावना है ।
इस आसन को करते समय समश्रुंभ पर बैठना चाहिये । खाली पेट रहना उपयोगी है । स्नान के पश्चात् प्रातःकाल इसकी साधना अच्छी होती है । इस आसन से चपटे भर तक चाहे बैठ सकते हैं, कोई त्राति की सम्भावना नहीं ।
बाँये पैर की पड़ी गुदा और इन्द्री के बीच में और दाये पैर की एड़ बाँये पैर पर लिङ्गोन्द्रिय के ऊपर रखनी चाहिये । सिर को सीधे, उड़ी-को मुका कर तथा आँखों को सामने करके कमर बिना मुकाये सीधे बैठ जाओ । शुरु शुरु में इसका अभ्यास करने में कुछ कठिनाई मात्स्य होगी । पर थोड़े दिनों के अभ्यास से ही यह साधा जा सकता है । जब कभी काम-विकार हृदय में पैदा हो, उसी समय यह आसन लगा कर बैठ जाना चाहिये और हृदय में परमात्मा का ध्यान कर अपने काम-विकार को धिक्कारना चाहिये । फिर देखिये आप के चित्त पर कैसा उत्तम प्रभाव होता है ।