ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 332, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ें३२९
वीर्य-रत्ना के सन्निधम
इनको पढ़ कर अभीष्ट फल प्राप्त करते हैं । इनका संग्रह धन के संग्रह से भी कहीं बढ़कर होता है । मनुष्य-जाति इन्हों की सहायता से सर्वोन्नति कर सकता है । कुविचारियों के भी विचार गढ़ पलट जाते हैं ।
• आजकल अश्लील तथा लज्जाजनक उपन्यासों के प्रचार से समाज की बड़ी दुर्गति हो रही है । विचारियों के दुराचारी होने का बहुत कुछ कलङ्क इनके सिर पर भी लगाया जा सकता है । घुरे साहित्य के प्रचार से समाज में दुराचार तथा न्यमिचार की वृद्धि होती है । इन घुरे ग्रन्थों से ब्रह्मचर्य का अधिक रूप से हास हो रहा है ।
अतः जो लोग वीर्य-रत्ना करना चाहें, वे घुरे ग्रन्थों से अवश्य बचें । और अपने अवकाश के समय में सदाचार, नीति, धर्म, जीवनचरित्र तथा गन्धीर विषयों के, जैसे रामायण, गीता, योग वाशिष्ठ, मनुस्मृति, दर्शन-शास्त्र तथा स्त्रा० विवेकानन्द, श्रृ० द्या-नन्द, स्त्रा० रामतीर्थ, रामकृष्ण परमहंस, तुकारामजी आदि के उत्तमोत्तम ग्रन्थों के पढ़ने में मन लगावें । पढ़ने का क्रम नित्य होना बहुत ही उपदेय होता है ।
(१) सद्ग्रन्थों के निरन्तर पाठ से कर्मनिष्ठा, प्रसन्नता, भीरता, सेवा-शक्ति, दया और गुणमाहकता की वृद्धि होती है ।
(२) चिन्ता, भय, पराधीनता, द्वेष तथा अहङ्कार से रक्षा होती है ।
(३) मन और मस्तिष्क को दृढ़ता और शान्ति मिलती है ।
तथा (४) मनुष्य व्यथोगी और परिश्रमी बन जाता है ।
२०