भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 334

३३१

वीर्य-रत्ना के सन्निधम्

(१८) शिव-सङ्कल्प

‘हमृतिष्टां अजिर्न जविष्टां तन्मैमनः शिव सङ्कल्पमस्तु ।

( यजुर्वेद )

‘सर्वे सङ्कल्पजाः स्मृताः ।’

( भगवत्सुति )

सभी उत्तमोत्तम कार्य सङ्कल्प से ही होते हैं ।

सङ्कल्पेन विना राजन्, यत्किञ्चित्कुरुते नष्टः ।

फलस्याल्पाल्पकं तस्य, धर्मस्याध्वन्यं भवेत् ॥

( पद्मपुराण )

हे राजन् ! सङ्कल्प के विना जो कृष्ट किया जाता है, उसका फल बहुत कम होता है, और उसके धर्म का आधा भाग नष्ट हो जाता है ।

हिन्दू-धर्म में प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ करने में सङ्कल्प करना पड़ता है । इस कृत्य में बहुत बड़ा तत्त्व छिपा हुआ है । सङ्कल्प-हीन कार्यों की पूर्ति में सन्देह रहता है । वीर्य-रत्नाजी भी एक प्रकार का व्रत है । जिसमें दृढ़ सङ्कल्प नहीं, वह इसमें कभी सफल नहीं हो सकता । सङ्कल्प के अनुसार ही शुभाशुभ कार्य भी होता है । इसलिये सदैव अपने सङ्कल्प को शुभ रखना चाहिये ।

सङ्कल्प इस प्रकार का होना चाहिये :—

मैं आज से ब्रह्मचर्य ( वीर्य-रत्ना ) में दत्तविद्या रहूँगा । न्यमिचार से सदैव घृणा करता रहूँगा । मैं पर-की पर कुट्टि न डालूँगा । मैं अपनी पत्नी से ही सन्तुष्ट रहूँगा । मैं अपनी मानसिक और शारीरिक उन्नति करूँगा । मैं परमात्मा और धर्म को छोड़कर किसी से न डरूँगा इत्यादि ।