भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 328, कुल 380 में से

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वीर्य-रत्ना के सन्निधम्

फलों में प्राकृतिकता विशेष है। बहुत से वैद्य लोग बड़े बड़े रोगियों को फल खाने की सलाह देते हैं। एकादशी जैसे कई उपवास प्रभों में भी लोग फल खाकर रह जाते हैं। भोजन कर लेने के पश्चात् फल खाना बहुत आवश्यक है। जो लोग काम-विकारों से विशेष पीड़ित हों, वे कुछ दिनों तक फल खाकर ही रहें। जो फल जिस च्छु में होता है, वह उस च्छु में अधिक लाभ-कारी होता है। वीर्य-रत्ना के लिये फलों का खाना भी बहुत लाभ-दायक है।

अब हम फलाहार से होने वाले कतिपय लाभों को नीचे लिखते हैं:—

( १ ) फलाहार से स्वास्थ्य, दीर्घायु, बल और बुद्धि की बढ़ती होती है।

( २ ) कोष्ठशुद्धता, निर्बलता, मल-विकार, ज्वर तथा अन्य रोगों से रक्षा होती है।

( ३ ) मन शान्त होकर सत्कर्मों में लगता है।

( ४ ) वीर्य पुष्ट होता है, काम-शक्ति की प्रेरणा दब जाती है, और इन्द्रियों पर विजय मिलती है।

(१४) दुग्ध-पान

इस संसार में यदि कोई पदार्थ अमृत कहलाने योग्य है तो वह दुग्ध ही है। प्रायः सभी वैद्यक शास्त्रों के रचयिताओं ने इस की प्रशंसा की है। पाश्चात्य देश के कई डाक्टर लोग केवल दुग्ध से ही कई रोगों को दूर करते हैं।

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