ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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सपन्न हो जाते हैं इस से वीर्य तथा अन्य धातुओं की ह्रां होती है ।
‘सर्वेषामेव रोगाणां, निदानं कुरपिता मलाः ।’
( वैद्यक
मल के बिगड़ने से ही प्रायः अनेक रोगों की उत्पत्ति होती है । ठीक समय से साफ़ पालवाना हो जाने से दिन भर स्फूर्ति, उद्योग शीलता, प्रसन्नता, सुखुद्धि और सदगुणों कं बृद्धि होती है । प्रसाद, अग्नि मन्दता, पीड़ा तथा न्वर आदि रोग नहीं सवाते ।
प्रातःकाल मल-मूत्र त्यागाने वाले का वीर्य शुद्ध और विका से रहित रहता है ।
( ४ ) उपस्थेन्द्रिय की स्वच्छता
‘उपस्थेन्द्रियमेवास्ति, पाप-रोग-प्रदायकम् ।’
( सृष्टि )
गुप्तेन्द्रियों की स्वच्छता से मन को शान्ति प्राप्त होती है, काम-विकारों की सम्भावना नहीं रहती तथा दाह, खुजली, दुर्गन्धि, क्रिभि और खण्डोष आदि से रक्षा होती है । नेत्रों में व्योति, मस्तिष्क में विचार की स्फूर्ति भी बढ़ती है ।
वास्तव में मनुष्य के लिये गुप्त इन्द्रियों को स्वच्छ रखना भी बड़ा हित कर है । इनकी अपवित्रता से भी विचार उत्पन्न हो जाता है । कई प्रकार के इन्द्रिय सम्बन्धी गुप्त रोग भी उत्पन्न