ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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वीर्य-रत्ना के सन्निधम्
( ४ ) मेधा और शक्ति की वृद्धि होती है । ( ५ ) कोष्ण-वृद्धता, अजीर्ण तथा स्तम्भ-दोष आदि राग नहीं होते ।
( ३ ) मल-मूत्र-विमर्जन
मूत्रोच्च्चारसमुत्सर्गः, दिवाकुर्यादुदड्मुखः । दक्षिणामिमुखो रात्रौ, सन्ध्ययोश्च यथादिव॥
( मवृत्स्थिति )
दिन में उत्तर मुख करके तथा रात में दक्षिण मुख करके मल-मूत्र-त्याग करना चाहिये !
वैद्यक-शास्त्र के मत से भी सूर्योदय से पहले मल-मूत्र का त्याग करना उपयोगी है । जहाँ तक हो खुले मैदान वाएकान्त स्थान में बस्ती में कुछ दूर मल-त्याग करना चाहिये; साथ ही दूसरे के किये हुए पर भी न करना चाहिए ।
प्राचीन समय में लोग प्रायः बस्ती से दूर जंगलों में टह्री जाया करते थे । इससे उन्हें छुट्टा वायु-खेवन का भी लाभ हो जाता था । साथ ही बस्ती में गंदगी भी नहीं फैलने पाती थी । पर खेद है कि इस नये फेरान के फेर में पड़ कर लोग प्राचीन और उपयोगी प्रणाली को भूलते जाते हैं !
मल-मूत्र की हाजत होने पर उसे न रोकना चाहिए । क्योंकि ऐसा करने से अनेक व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं ।
आलस्य-वश जो लोग इस आवश्यकता को रोकते हैं, वे अपने स्वास्थ्य को खो बैठते हैं । उनके मलाशय और मूत्राशय में विकार