ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 314, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ें३११
वीर्य-रत्ना के सलियम
होते हैं। अस्वच्छता के कारण इन्द्रियों में उत्तेजना होने से वीर्य-पात का कारण भी हो सकता है। इसलिये शीघ्र के समय प्रायः दोनों चार गुप्त इन्द्रियों को शुद्ध और ठण्डे जल से धो डालना चाहिये। इस समय के अतिरिक्त जननेन्द्रिय का दूना बहुत ही हानिकारक माना गया है।
वहूत से लोग तो मूत्र-स्थाने के पश्चात् भी अपने गुप्त इन्द्रिय को जल से धो देते हैं। यह प्रणाली भी वहूत अच्छी है। इस में भी वीर्य-रत्ना का तत्व भरा हुआ है।
( ५ ) वायु-सेवन
सुख प्रवातं सेवेत, श्रीषो शरदि चान्तरा । निर्वातमायुषे सेव्यमारोग्यायच सवदा ॥
( वायुवैद )
श्रीष्म और शरद् ऋतु में सुख-पूर्वक वायु-सेवन करना चाहिये। और अन्य ऋतुओं में भी आयु और आरोग्य के लिये कम हवा के स्थान पर घूमना चाहिये।
वैद्यक-शास्त्र में भिन्न-भिन्न दिशा की वायु का भिन्न-भिन्न गुण लिखा गया है। आधिक वायु में घूमना कभी कभी हानिकारक होता है, इसलिये वर्जित है। प्रातःकाल त्रिभिष वायु चलती है, जो स्वास्थ्य के लिये वहूत ही अच्छी मानी गई है।
वहूत से लोग सन्ध्या समय छवियों में टहलने जाते हैं। पर प्रातःकाल का टहलना विशेष उपयोगी होता है। वायु-सेवन न करने वालों का स्वास्थ्य भी अच्छा नहीं रह सकता। कई दोनों