ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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वीर्य-रक्षा के सत्रियम
हैं कि इन सदुपायों के करने में यदि उनमें कुछ लाभ न हुआ, तो हानि तो किसी प्रकार की हो ही नहीं सकती। विरोध कहना न्यर्थ है !
(१) ब्राह्ममुहूर्त्त-जागरपा
ब्राह्मे मुहूर्त्तं वृष्येत्, धर्माभ्यां चासुचित्तयेत् । कायकृशोश्च तन्मूलान्वेदतत्पार्थ मेव च ॥
( मनुस्मृति )
ब्राह्म मुहूर्त्त में व्रत कर धर्म और अर्थ का चिन्तन करना चाहिये। अपने शरीर के क्लेशों और उनके कारणों पर विचार करना चाहिये और वैदों के तत्वों का अध्ययन करना चाहिये।
रात के चौथे पहर का नाम ब्राह्ममुहूर्त्त है। बहुत प्राचीन समय से इस समय व्रतने का विधान है। क्योंकि इस समय त्रिविध वायु चलती है, प्रकृति सौम्यता और सुन्दरता से भर जाती है, तथा सर्वत्र शान्ति और प्रसन्नता के दृश्य दिखलाई पड़ते हैं। सूर्योदय से पहले व्रत जाना स्वास्थ्य के लिये बड़ा ही उपयोगी है। इस समय में व्रतने की आज्ञा धर्म-शास्त्र और आयुर्वेद-शास्त्र, दोनों के मत में हितकर माना गया है। इसे देव-बेला भी कहते हैं। दिन रात में यह समय बहुत ही उत्तम होता है। सत्कार्यों के करने के लिये ही ईश्वर ने यह समय बनाया है। इस समय में व्रतने वाला मनुष्य स्वस्थ और सदाचारी बन जाता है। जो लोग इस समय सोते रहते हैं, वे प्रायः अल्पायु, आलसी, दरिद्री, दुरात्मा इती और विषयी होते हैं। इसलिये वीर्य-रक्षा के इन्तुकों को चाहिये कि सदा ब्राह्ममुहूर्त्त में व्रतने का उपयोग करें।