ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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वीर्य-रत्ना के संक्षिप्त
करने से पसीना आता है और इसलिये शरीर का मल दूर होता है।
हिन्दू-धर्म में स्नान का बड़ा साहाय्य है। यह विज्ञान से बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है। अन्तः शुद्धि के साथ साथ बाह्य शुद्धि की भी मनुष्य के लिये आवश्यकता होती है। जो लोग स्नान नहीं करते, वे प्रायः आलसी होते हैं और चर्म-रोगों में फँसे रहते हैं।
प्रायः-काल का स्नान बहुत ही उपयोगी होता है। सायङ्काल को भी स्नान किया जा सकता है। ग्रीष्म-ऋतु में दो बार स्नान करना आवश्यक है। प्रत्येक स्त्री-पुरुष को सदैव कम से कम एक बार तो अवश्य ही स्नान कर लेना चाहिये। स्नान के समय सारे शरीर को भलीभाँति मल-मल कर धोना चाहिये। स्नान के लिये स्वरुद्ध और ताजा जल बहुत ही उपयोगी माना गया है। शरद ऋतु में अधिक शीत पड़ने पर गरम जल से भी स्नान करना हानिकारक नहीं है। पर शिर को पहले पहल ठण्डे जल से ही धो लेना चाहिये। कृष जल सभी ऋतुओं में नहाने में लाभ-दायक होता है। थोड़े जल से नहाने में शरीर के छोटे छोटे छिद्रों का मल दूर नहीं होता, और भीतर का दोष बाहर नहीं निकलने पाता। इसलिये यदि नदी पास हो तो उसी के जल में नियमित रूप से स्नान करना चाहिये। मित्य स्नान से वीर्य तथा शरीर के अन्य धातुओं को शान्ति मिलती है।
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