भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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(७) कौपीन-धारण

‘कौपीनवस्त्रः खलु भाग्यवन्तः ।’

(शंकराचार्य)

कौपीन के (लङ्कोट के) धारण करने वाले वास्तव में भाग्यवान् पुरुष ही होते हैं।

इस देश में कौपीनधारी प्रायः ब्रह्मचारी और संन्यासी ही हैं। ये इसलिये कौपीन पहनते हैं कि वपस्थेन्द्रियों में काम-विकार से उत्तेजना न उत्पन्न होने पावे। इन्हें वीर्य-रक्षा की विशेष रू से आवश्यकता रहती है। ब्रह्मचारी और संन्यासियों के लिए कौपीन धारण करने का शास्त्रीय नियम भी प्राचीन समय चला आता है। इसके अतिरिक्त मरुल-युद्ध (कुरती) करने वा भी कौपीन (लङ्कोट) पहनते हैं। क्योंकि इन्हें भी वीर्य-रक्षा लिये संयम रखना पड़ता है। विषय-लोलुषों को कौपीन धार करना बहुत दुष्ट जान पड़ता है।

कौपीन का वस्त्र बहुत मोटा न होना चाहिये। दोहरा हो से इन्द्रिय पर विशेष गर्मी पहुँचने से भी वीर्य-पात हो सका है। एक पतला और खच्छ ब्रह्म कौपीन (लङ्कोट) के लिये बर उपयोगी है।

कुछ लोगों की धारण सी हो गई है कि धोती के नीचे कौपीन (लङ्कोट) धारण करने से महानुष्य नपुंसक हो जाता है। य बात मिथ्या है। इससे तो बल्कि अधिक समय तक के लिए पुंसत्व रक्षित रहता है। कौपीन धारण करने से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—