भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य की व्याख्या

पैतरेयोपनिषत्—

“प्रज्ञानं वै ब्रह्म ।”

अर्थात् वेद साक्षात् परमेश्वर है ।

मनुस्मृति—

“ब्रह्मभ्यासेन वाजस्वमनन्तसुखमश्नुते ।”

अर्थात् वेद के सर्वत्र अध्ययन करने से अपरिमित सुख मिलता है ।

कैवह्योपनिषत्—

“यत्परब्रह्म सर्वात्मा, विभ्रमस्यावतर्न महत् ।”

अर्थात् जो परब्रह्म है—सर्वात्मा है, और संसार का श्रेष्ठ धाम है ।

वेदान्तदर्शन—

“अशातो ब्रह्म-जिज्ञासा ।”

अर्थात् अब हम परमात्म-तत्व की विवेचना करते हैं ।

ऊपर के अवतरणों से पाठक समझ गये होंगे कि ‘ब्रह्म’ से वीर्य, वेद और ईश्वर का बोध होता है । ब्रह्मचर्य-व्याख्या—कहने का अभिप्राय यह है कि वीर्य, वेद और ईश्वर का—रत्न, अण्व-यंत तथा चिन्तन ही ‘ब्रह्मचर्य’ है । इन तीनों में से एक भी कम हुआ, तो ब्रह्मचर्य की सम्पूर्णता नहीं प्राप्त हो सकती ।

३-ब्रह्मचर्य के आविष्कारक

गयन्ति देवाः किल गीतकानि—

धन्यास्तु ये भारत-भूमि-भागे ।

स्वर्गापवर्गस्य च हेतु-भूते,

भवन्ति भूयः पुरुषाः सुखत्वात् ॥

(श्रीमद्भागवत)