ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य की व्याख्या
पैतरेयोपनिषत्—
“प्रज्ञानं वै ब्रह्म ।”
अर्थात् वेद साक्षात् परमेश्वर है ।
मनुस्मृति—
“ब्रह्मभ्यासेन वाजस्वमनन्तसुखमश्नुते ।”
अर्थात् वेद के सर्वत्र अध्ययन करने से अपरिमित सुख मिलता है ।
कैवह्योपनिषत्—
“यत्परब्रह्म सर्वात्मा, विभ्रमस्यावतर्न महत् ।”
अर्थात् जो परब्रह्म है—सर्वात्मा है, और संसार का श्रेष्ठ धाम है ।
वेदान्तदर्शन—
“अशातो ब्रह्म-जिज्ञासा ।”
अर्थात् अब हम परमात्म-तत्व की विवेचना करते हैं ।
ऊपर के अवतरणों से पाठक समझ गये होंगे कि ‘ब्रह्म’ से वीर्य, वेद और ईश्वर का बोध होता है । ब्रह्मचर्य-व्याख्या—कहने का अभिप्राय यह है कि वीर्य, वेद और ईश्वर का—रत्न, अण्व-यंत तथा चिन्तन ही ‘ब्रह्मचर्य’ है । इन तीनों में से एक भी कम हुआ, तो ब्रह्मचर्य की सम्पूर्णता नहीं प्राप्त हो सकती ।
३-ब्रह्मचर्य के आविष्कारक
गयन्ति देवाः किल गीतकानि—
धन्यास्तु ये भारत-भूमि-भागे ।
स्वर्गापवर्गस्य च हेतु-भूते,
भवन्ति भूयः पुरुषाः सुखत्वात् ॥
(श्रीमद्भागवत)