भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान .

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यह वही महत्त्वशाली महादेश है, जहाँ की सम्पत्ता अपने अलौ-किक गुणों के कारण, एक बार उन्नति की चरम-सीमा को पहुँच गई थी। यह वही पुराय-प्रधान भूमि है, जहाँ का अन्तिम आलोक ग्रहण कर आधुनिक सभ्य तथा उन्नत कहलाने वाले देशों के निवासी, विश्व में अपनी विजय-वैजयन्ती उड़ा रहे हैं। वास्तव में हमारे उस गौरव-नरिमामय वैभव-विकास के आश्रय-भूत, इस देश में रहनेवाले, परम स्वार्थत्यागी और त्रिकालदर्शी ऋषि, मुनि तथा महात्मा लोग थे, जो उच्च पर्वतों की कन्दराओं और हरे-भरे वनों की कुटियों में बस कर, समस्त मनुष्य-जाति के लिये हितकर, एवं सुख-शान्तिमय उपाय सोचा करते थे। उनके सत्सिद्धान्त कोरी कल्पना (Theory) की अरसित भित्ति पर ही नहीं ठहरते थे, वरन् वे आदर्श विज्ञान (Science) की खरी कसौटी पर सुदृढ़ अभ्यास (Practice) द्वारा कसे जाकर ही जनता में प्रच-लित किये जाते थे। यही एक मुख्य कारण था कि उनके अनुगमन से प्रजा सदा फूलती-फलती रही। उन्होंने सामाजिक जीवन को नियम-बद्ध किया। ईश्वर की सत्ता को स्थिर रखने के लिये तथा मानवी-स्थिति को कुमार्ग-गामिनी होने से बचाने के उद्देश्य से, अनेक शास्त्रों की रचना की, और उनमें अनेक अमूल्य, उच्च तथा स्वभाविक विधान किये। उन्होंने स्वभाव-सिद्ध ब्राह्मणादि चार वर्णों और ब्रह्मचर्यादि चार आश्रमों की योजना की। जैसे वर्णों में ब्राह्मण, वैसे आश्रमों में ब्रह्मचर्य को प्रथमता और श्रेष्ठता का स्थान मिला। इस रहस्य-पूर्ण प्रणाली को हम उनके सर्वतोभद्र-मस्तिष्क और दिव्य-दृष्टि का सबसे बड़ा उत्पादन मानते हैं। संसार की प्राथमिक अवस्था में, वास्तव में, यह उनकी अपूर्व योग्यता: