ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य की प्राचीनता
थी। अतएव ब्रह्मचर्य के मूल आविष्कारक, इसी देश के प्राचीन महात्मा तथा दूरदर्शी देव-पुत्र्य पुरुष थे। इन्होंने के कारण कई शताब्दियों तक ब्रह्मचर्य-प्रथा का प्रचार धार्मिक रूप से भारत में ही किया, समस्त भूमण्डल में उत्तरोत्तर-वृहत दिनों तक बढ़ता गया।
काल के प्रभाव से उस सुवर्ण-युग का अन्त हो गया। भारत में आज वे महर्षि तथा सिद्ध लोग नहीं रहे, पर जिस कल्याणप्रद मार्ग को दिखला गये, वह इस पवित्र समय में भी उनका स्मरण दिलाता है। यदि हम अपनी अज्ञानता और अभिमान को छोड़ कर, उनकी बातों पर विश्वास और प्रेम कर, ब्रह्मचर्य-प्रणाली को पुनः उसी रूप में प्रचलित करें, तो वास्तव में हम फिर भी उनकी आत्मा को दर्शन नवीन शरीर में कर सकते हैं। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि ब्रह्मचर्य के प्रभाव से भविष्य में हम भी वैसे ही आविष्कारक तथा सत्पुरुष हो सकेंगे।
४—ब्रह्मचर्य की प्राचीनता
ब्रह्मचर्य-प्रथा के आविष्कार-काल के सम्बन्ध में कुछ कहने के लिये, विश्व का इतिहास सूक्ष्म है। इसलिये यह बात निश्चय रूप से नहीं कही जा सकती कि यह प्रथा अमुक समय में ही प्रचलित हुई थी। पर ही, इतना तो कई उदाहरणों से जान पड़ता है कि इसका स्वेभाव वैदिक काल से पहले हो चुका था। जैसा कि मित्र-लिखित सन्ध से भी सूचित होता है:—
ब्रह्मचर्येण तपसा, देवा मृत्युमुपागत ।
इन्द्रोह ब्रह्मचर्येण, देवेभ्यः स्वरामरत् ॥
(अथर्ववेद)