भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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ब्रह्मचर्य के तपोयल से देवों ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की, और इन्द्र को इसी ब्रह्मचर्य के पुराय-प्रताप से सुरों में उद्यासन मिला ।

वास्तव में हमारे वेद-कालीन आर्यों ने इसका पूर्ण-रूप से विकास तथा सर्वश्रेष्ठ प्रचार किया था—वस समय की आश्रम-प्रथाओं से भी यह बात स्पष्ट-स्पष्ट भलकती है। यह प्रथा पौराणिक काल तक अधिक मर्यादित रही, और यहाँ फिर इसकी धीरे-धीरे अवनति होने लगी और इस दशाको पहुँची ।

सृष्टि-सम्बन्ध पर बहुत मत-भेद है। यदि लोकमान्य तिलक के मत से वैदिक सभ्यता का समय ८००० वर्षों से पूर्व मानें, तो भी हमारी ब्रह्मचर्य-प्रथा इससे विशेष प्राचीन ठहरेगी। वेदों में कई स्थानों पर ब्रह्मचर्य विषयक मन्त्र आये हैं। उनमें कहीं सद्गुण और कहीं प्रकट रूप से ब्रह्मचर्य के वर्णन हैं। प्रथम तीन वेदों में सूक्ष्म रीति से ब्रह्मचर्य का वर्णन है, पर चौथे वेद (अथर्वण) में इसका उल्लेख बहुत सार-गर्भित रूप में किया गया है, जो आगे यथास्थान दिया जायगा ।

वेदों के पश्चात् उपनिषदों की गणना है। हमारे कई उपनिषदों में ब्रह्मचर्य-विषय की आख्यायिकायें आई हैं, और उनमें के अन्तर्गत इस सम्बन्ध के मनोहर उपदेश भी दिये गये हैं, जिन्हें हम प्रसङ्ग-प्रसङ्ग पर पाठकों के लिये उपस्थित करेंगे ।

वेद तथा उपनिषदों के पश्चात् पुराण, रामायण, महाभारत और विविध ग्रन्थशास्त्र, प्रमाण-कोटि के ग्रन्थ हैं—इन ग्रन्थों में भी ब्रह्मचर्य की कथायें, पालन की शिक्षायाँ, विविध प्रशंसायें तथा निश्चित की हुई विधियाँ मिलती हैं । इसलिये ऐसी अवस्था में