ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य की प्राचीनता
इसकी प्राचीनता में कोई सन्देह ही नहीं रह जाता। प्राचीन ग्रन्थों में ऐसा कोई विरला ही ग्रन्थ होगा, जो ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में अपना भिन्न मत रखता हो, और कुछ न कुछ उपदेश न देता हो।
आज से ५००० वर्ष पहले हमारी रामायण और महाभारत के समय में भी अनेक पुरुष ब्रह्मचर्य के पालन में आदर्श स्वरूप हो गये हैं। पुरुष ही नहीं, बहुत सी स्त्रियाँ भी इस अलौकिक धर्म की दृढ़ अनुयायिनी थीं। हिन्दू-राजाओं के अधःपतन-काल में भी उस ब्रह्मचर्य का दीपक कहीं-कहीं टिमटिमा रहा था। वास्तव में ब्रह्मचर्य का इतिहास भारतीय सभ्यता के इतिहास से कम प्राचीन नहीं है। इसका उत्थान और पतन सभ्यता के साथ ही साथ होता आया।
५-ब्रह्मचर्य की महिमा
ब्रह्मचर्य-प्रतिष्ठायां, वीर्य-लामो भवत्यपि।
सुरत्यं मानवोयाति, चान्तेयाति परांगतिम् ॥
(चण्डि)
ब्रह्मचर्य का पालन करने से वीर्य का लाभ होता है। ब्रह्मचर्य की रक्षा करने वाले मनुष्य को दिव्यता प्राप्त होती है, और साधना पूरी होने पर, परम गति भी उसे मिलती है।
ब्रह्मचर्य की महिमा अपार है। वाणी से उसका वर्णन करना सूर्य को दीपक से दिखाने के समान है। 'ब्रह्मचर्य' वह उग्र व्रत है, जिसकी साधना से लोग नर से नारायण हो सकते हैं। इसके पालन से अब तक अनेक लोग देव-कोटि में गिने गये। तभी तो