भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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भगवान् शङ्कर ने अपने मुखारविन्द से इस प्रकार कह कर, आदेश किया है:—

न तपस्तपस्तत्प्राहृष्टम्वच्यं तपोचमम् । उध्वरेतामचेद्यस्तु, सदेवो नतुमातुपः ॥

तप कुछ भी नहीं है । ब्रह्मचर्य ही उत्तम तप है । जिसने अपने वीर्य को वश में कर लिया है, वह देव-स्वरूप है—भतुष्य नहीं !

“एकतक्षतुरो वेदा, ब्रह्मचर्यं तथैकतः ।”

( छान्दोग्योपनिषत् )

एक ओर वा चारों वेदों के उपदेश, और दूसरी ओर ब्रह्मचर्य—दोनों एक गुला पर रखकर तौले जायें, तो दोनों पलड़े बराबर होंगे । अर्थात् ब्रह्मचर्य का महत्व वेदों से भी विशेष है ।

“तेषामेवैव स्वर्गलोकौ, येषां तपो ब्रह्मचर्यं, येतु सत्यं प्रतिष्ठितम् ।”

( प्रश्नोपनिषत् )

उन्हीं जनों को स्वर्ग-सुख मिलता है, जिन्होंने ब्रह्मचर्य जैसे तप का अनुष्ठान किया है, और जिनके हृदय में ब्रह्मचर्य स्वी सत्य विराजमान है ।

ब्रह्मचर्यं पालनीयं, देशानामपि दुर्लभम् । वीर्यं सुरक्षितेयान्ति, सर्वलोकार्थ-सिद्धम् ॥

( सूक्ति )

ब्रह्मचर्य का पालन करना योग्य है । देवों के लिये भी ब्रह्म-