भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-चिन्हाण

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प्राणभूतं चरित्रस्य, परब्रह्मैककारणम् । समाचरन् ब्रह्मचर्यं, पूजितैरपिपूज्यते ॥

( देवचन्द्र श्रि )

ब्रह्मचर्य सन्वरित्रता का प्राण-स्वरूप है, इसका पालन करता हुआ मनुष्य, सुपूजित लोगों से भी पूजा जाता है ।

ऊपर के श्लोकों में जिस ब्रह्मचर्य के इतने गुण बतलाये गये हैं, उसके विषय में अधिक कहने की आवश्यकता नहीं ।

पाठक इतने से ही ब्रह्मचर्य की महिमा का अनुमान कर सकते हैं । हमारे विचार से तो ब्रह्मचर्य की यथार्थ महिमा कहने और सुनने से नहीं विहित हो सकती ! इसको तो भली भाँति वे ही जान सकते हैं, जो कुछ समय तक इस व्रत की साधना करें । क्योंकि ब्रह्मचर्य जैसे आध्यात्मिक तत्व का रस, उसके अन्तर्गत भरा रहता है । जो लोग इसके प्रेमी होते हैं, वे ही उसे पीकर उसके अपूर्व स्वाद का उचित अनुभव कर सकते हैं ।

६-धन्वन्तरि का ब्रह्मचर्योपदेश

भगवान् धन्वन्तरि का नाम संसार में बहुत प्रख्यात है । वे आयुर्वेद के प्रचार करने वाले—भीष्म-भारिण वैद्य कहें जाते थे । ऐसा कहा जाता है कि वे युवक को भी एक बार अपने तप तथा विन्योपधि के प्रभाव से जीवित कर सकते थे ।

वें ही धन्वन्तरि महाराज एक दिन शिष्यों के साथ अपने आश्रम में बैठे हुये, आयुर्वेद का उपदेश कर रहे थे । पाठ समाप्त होने पर शिष्यों ने उनसे प्रश्न किया कि भगवन् ! कोई ऐसा एक ही उपचार बतलाइये, जिसके सेवन से सब प्रकार के रोगों का

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