भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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धन्वन्तरि का ब्रह्मचर्योपदेश

नाश हो सके । आप मनुष्य-मात्र के कल्याण के लिये अपना सब से अनुभूत उपाय बताने की दया कीजिये ।

शिष्यों के प्रश्न को सुनकर भगवान् धन्वन्तरि अत्यन्त प्रसन्न हुये, और उन्होंने कहा कि प्रिय वत्स ! तुम लोगों को हृदय से ऐसा ही एक उपचार बतलाता हूँ—इसकी सत्यता में मुझे तनिक सन्देह नहीं है । तुम लोग ध्यान देकर सुनो !

मृत्युज्याधिजरात्नाशौ-पीयुषं परमौपधम् । ब्रह्मचर्यं महद्यत्नं, सत्यमेव वदाम्यहम् ॥

मैं इस बात को तुम लोगों से सत्य-सत्य कहता हूँ कि मरण, रोग तथा दुष्टता का नाश करने वाला—अमृत रूप और बहुत बड़ा उपचार, मेरे विचार से ब्रह्मचर्य है ।

शान्तिर्काम्निस्मृतिज्ञानं भारोग्यञ्चापिसन्ततिम् । य इच्छति महद्दमं, ब्रह्मचर्यं चरेदिह ॥

जो शान्ति, सुन्दरता, स्मृति, ज्ञान, स्वास्थ्य और उत्तम सन्तति चाहता है, वह इस संसार में सर्वोत्तम धर्म ब्रह्मचर्य का पालन करे ।

ब्रह्मचर्यं परंज्ञानं, ब्रह्मचर्यं परं बलम् । ब्रह्मचर्यमेवो ह्यात्मा, ब्रह्मचर्यैव तिष्ठति ॥

ब्रह्मचर्य सब से उत्तम ज्ञान है । ब्रह्मचर्य अपरिमित बल है । यह आत्मा निश्चय रूप से ब्रह्मचर्यमय है, और यह मनुष्य-शरीर में ब्रह्मचर्य से ही ठहरता है ।

ब्रह्मचर्यं नमस्कृत्य, वासाध्यं साधयाम्यहम् । सर्व-लक्षणं हीनत्वं, हन्यते ब्रह्मचर्यया ॥ ब्रह्मचर्यमय भगवान् को प्रणाम कर, मैं असाध्य रोगियों