ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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सत्य और ब्रह्मचर्य
से हीन होने पर आत्मा का अस्तित्व नहीं रह सकता । जैसा कि उपनिषदों में लिखा है:—
सत्य मेव जयते नाशुतम् । सत्येन पन्थावित्तो देवयानः ॥ येनाक्रमन्तृषयो ह्यासकामा । यत्र तत्सत्यस्य परमनिधानम् ॥
सत्य की ही जय होती है, असत्य की नहीं ! सत्य से ही देवों का मार्ग मिलता है । ऋषि लोग भी सत्य के प्रभाव से सफल होते हैं, जहाँ सत्य की सत्ता है, वहाँ सब सुख है ।
हमारे विचार से जिस सत्य का वर्णन ऊपर आया है, वह यही ब्रह्मचर्य है । जो पुरुष ब्रह्मचर्य का नाश करता है, वह अपने को सत्य से प्रत्यक् करता है । इसके पालन से मनुष्य सत्य को अधिकार में कर लेता है, और वह सत्य उस को सुखी बनाता है ।
हमारे भीष्म पितामह ने ब्रह्मचर्य को सत्य शब्द से अभिहित किया है । अपनी प्रसिद्धा की दृढ़ता प्रकट करने के लिये, उन्होंने सत्य का ही नाम लेकर, ब्रह्मचर्य को महत्व दिया है ।
विक्रमं वृजहा जहाद्भर्म जहाच्च धर्मराज । नत्वहं सत्यमुत्पृङ्, व्यवसेयं कथञ्चन ॥
(महाभारत)
चाहे इन्द्र अपने पराक्रम को छोड़ दें, और धर्मराज अपने धर्म को छोड़ दें, पर जिस सत्य (ब्रह्मचर्य) को मैंने धारण किया है, उसे कदापि नहीं छोड़ सकता ।
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