ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य-विधान
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अब पाठक सत्य और ब्रह्मचर्य की एकता और रहस्य को समझ गये होंगे ।
भिस पुरुष के हृदय में सत्य की कुछ भी प्रतिष्ठा है—जो सत्य का पालन करना चाहता है, वह इस ब्रह्मचर्य रूपी सत्य का पालन कर सद्गति को प्राप्त हो ।
१४—कर्तव्य और ब्रह्मचर्य
“जयं प्राप्नोति संज्ञामे, यः सुकार्याण्यनुष्ठते ।”
( विदुरनीति )
सर्कतव्यों का पालन करने वाला ही पुरुष संज्ञाम में विजय-लाम करता है ।
कर्तव्य मेव कर्तव्यं, प्राप्तेः कण्ठगतेरपि ।
अकर्तव्यं न कर्तव्यं, प्राप्तेः कण्ठगतेरपि ॥
( नीति-शास्त्र )
अपने कर्तव्य का पालन प्राणों के निकलने तक करना चाहिये ! पर जिसे हम अकर्तव्य समझते हैं, उसे प्राणों के जाने पर भी करना योग्य नहीं ।
कर्तव्य से ही समाज की स्थिति है—कर्तव्य से ही दोषों का नाश होता है—कर्तव्य के पालन से ही मनुष्य को सुख-शान्ति मिल सकती है, और कर्तव्य ही सब का सार है । कर्तव्य से हीन होने पर कदापि सुख नहीं मिलता । अकर्तव्य के समान पाप भी नहीं ।
हम ब्रह्मचर्य को ही सब कर्तव्यों का कर्तव्य मानते हैं ।