ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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कर्तव्य और ब्रह्मचर्य
संसार के सारे कर्तव्य एक ब्रह्मचर्य की आवश्यकता रखते हैं। ब्रह्मचर्य के बिना एक भी कर्तव्य नहीं हो सकता !
“कर्तव्य सर्व-साधकम् ।”
( सूक्ति )
कर्तव्य ही मनुष्य के सब कार्यों को साधने वाला है । हमारा ब्रह्मचर्य भी सब का साधने वाला सिद्ध हो चुका है । अतएव वह पूर्ण रूप से कर्तव्य कहा जा सकता है । इस कर्तव्य के सामने विश्व के सभी कर्तव्य मूक हो जाते हैं । इस ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला पुरुष ही सब कर्तव्यशील है, और वह सब सुखों को सहज में प्राप्त कर लेता है ।
वैश्वीर्योपनिषद् में आचार्य-द्वारा कर्तव्य की बहुत ही उत्तम परिभाषा की गई है, और उसी वचन में कर्तव्य-पालन की आह्वा भी ब्रह्मचारी को दी है । उसे हम यहाँ उद्धृत करते हैं :—
“यान्यनवधानिकर्माणि तानि सेवितव्यानि, नो इत्पाणि ।” ( उपनिषत् )
जो निर्दोष कर्म हैं, वे ही कर्तव्य हैं । अकर्तव्य का सेवन करना योग्य नहीं वरन् मूर्खता है ।
इस से यह विदित होता है कि जिसने दोष-रहित कर्म हैं, सब की गणना कर्तव्य में है । उनका पालन करना शास्त्र-सङ्गत है । वे सभी कर्तव्य ब्रह्मचर्य के बिना नहीं सध सकते । अतः इस प्रकार वे भी ब्रह्मचर्य सब कर्तव्यों का मूल है ।
अब पाठक भलीभाँति समझ गये होंगे कि ‘ब्रह्मचर्य’ ही श्रेष्ठ कर्तव्य है, अतएव जिसे कर्तव्य का पालन करना हो, वह ब्रह्मचर्य का पालन करे ।