भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-चिन्तन

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१५— यम-नियम और ब्रह्मचर्य

“अहिंसा सत्यस्तेय-ब्रह्मचर्यापरिग्रहो यमाः ।”

( योगदर्शन )

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—ये पाँच यम कहलाते हैं ।

मन, वचन और कर्म से किसी को कष्ट न देने का नाम ‘अहिंसा’ है । जैसा कुछ देखा-सुना और जो मन में हो, उसे उसी रूप में कहने को ‘सत्य’ कहते हैं । पराये धन का लोभ न करना ‘अस्तेय’ है । उपस्थित्व का संयम तथा वीर्य-रक्षा का नाम ‘ब्रह्मचर्य’ और शरीर-यात्रा के निर्वाह से अधिक भोग-सामग्री का एकत्र न करना ‘अपरिग्रह’ कहलाता है ।

अब हम महर्षि पतञ्जलि के कहे हुये यमों के लाभों का वर्णन करते हैं । वे इस प्रकार हैं—

“अहिंसा-प्रतिष्ठायां तत्त्वनिधौ वैर-त्यागः ।”

( योगदर्शन )

‘अहिंसा’ के पालन से वैर-भाव का त्याग होता है । अर्थात् सब जीवों पर दया करने से वे भी प्रेम करते हैं ।

“सत्य-प्रतिष्ठायां क्रिया-फलाश्रयत्वम् ।”

( योगदर्शन )

‘सत्य’ के पालन से सभी कार्य सिद्ध होते हैं । वचन के प्रभाव से दूसरों तथा अपने को सुख मिलता है ।

“अस्तेय-प्रतिष्ठायां सर्व-रक्षोपस्थानम् ।”

( योगदर्शन )