भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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यम-नियम और ब्रह्मचर्य

‘अस्तेय’ के पालन से सब कुछ स्वयं प्राप्त हो जाता है। अभि- प्राय यह है कि वह सब का विश्वासपात्र बनता है।

“ब्रह्मचर्य-प्रतिष्ठायां वीर्य-लाभः।”

(योगदर्शन )

‘ब्रह्मचर्य’ का पालन करते से वीर्य का लाभ होता है। अर्थात् उसे शारीरिक और मानसिक बल की प्राप्ति होती है।

“अपरिग्रहस्यैवं जन्मकथन्तासन्तोषः।”

(योगदर्शन )

‘अपरिग्रह’ के पालन से जन्म-सुधार के विचार उत्पन्न होते हैं। हृदय में निस्वार्थता का भाव वृद्धि होता है।

महर्षि पतञ्जलि ने इन पाँचों यमों को अकाङ्क्ष तथा सार्व- भौम महाव्रत माना है। अर्थात् इनका पालन सब जाति, सब देश, सब समय और सब अवस्था में किया जा सकता है।

अब हम उनके योगदर्शन में लिखे हुये नियमों का आवश्यक वर्णन करते हैं:—

“शौच-सन्तोष-तपः-स्वाध्यायेश्वर-प्रणिधानानि नियमाः।”

(योगदर्शन )

शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान—ये पाँच नियम कहलाते हैं।

शारीरिक और मानसिक पवित्रता का नाम ‘शौच’ है। भोग के साधनों को अनिच्छा का नाम ‘सन्तोष’ है। सुख-दुःख, शीत- उष्णदि द्रव्य सहने, तथा परिमित आहार-विहार करने का नाम ‘तप’ । ओङ्कारादि जप और वेद-शास्त्रों के अध्ययन का नाम ‘स्वा-