भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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ध्याय' है, और फल-रहित हो, परमात्मा की उपासना का नाम 'हैश्वर-प्रणिधान' है।

अब नियम के पालन से जो फल प्राप्त होते हैं, उन्हें भी एक एक कर कहते हैं:—

“शौचस्त्वाङ्गं जुगुप्सा परैरेसंसर्गः।”

“सत्त्वशुद्धि सौमनस्यैकाग्र्येन्द्रिय ज्ञायात्मदर्शनयोग्यत्वधानिच्च।”

( योगदर्शन )

बाह्य 'शौच' से शरीर का मोह और पराये के साथ सम्बन्ध की इच्छा नहीं रहती। 'आभ्यन्तर' शौच से मन की शुद्धि, प्रसन्नता, एकाग्रता, इन्द्रिय-जय और आत्म-दर्शन की योग्यता प्राप्त होती है।

“सन्तोषादुत्तुलम सुखलाभः।”

( योगदर्शन )

'सन्तोष' की साधना से परम सुख मिलता है। छुपना का नाश होने से मन की अशान्ति दूर हो जाती है।

“कायेन्द्रिय शुद्धिरशुद्धि ज्ञायासपसः।”

( योगदर्शन )

'वप' की साधना से सुन्दर स्वाध्याय और इन्द्रियों पर अधिन्कार प्राप्त होता है

“स्वाध्यायादिष्ट देवता संप्रयोगः।”

( योगदर्शन )

'स्वाध्याय' करने से इष्ट-साधन और आत्म-ज्ञान की उपलब्धि होती है।

“समाधि-सिद्धिरीश्वर-प्रणिधानात्।”

( योगदर्शन )