भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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यम-नियम और ब्रह्मचर्य

‘ईश्वर-प्रणिधान’ से समाधि ( अत्यन्त शान्ति ) मिलती है । आत्मा या परमात्मा में लीन होने पर कोई सुख फिर शेष नहीं रहता । यह सर्व-सम्मत सिद्धान्त है ।

यद्यपि यम और नियम योग के अङ्ग हैं, तथापि ये ‘ब्रह्मचर्य’ के भी प्रधान अवयव हैं । ब्रह्मचर्य की दशा में प्रत्येक ब्रह्मचारी को पाँच यमों और पाँच नियमों का पालन नितान्त आवश्यक है । विना इनके ब्रह्मचर्य की कदापि सिद्धि नहीं हो सकती है ।

धर्माचार्य मनु ने भी यम और नियमों के सम्बन्ध में अपनी ऐसी ही सम्मति प्रकट की है:—

यमान्सेवत सतर्त, न नित्यं नियमान्बुधः ।

यमान्यतत्यकुर्वीणो, नियमान्क्रेवलान्मज्जन ॥

( मनुस्मृति ) बुद्धिसान् सदैव यमों का सेवन करे, नियमों का पालन नित्य न भी करे, क्योंकि यमों का न पालन करने वाला मनुष्य केवल नियमों का पालन करता हुआ भी पतित हो जाता है ।

अभिप्राय यह है कि अहिंसा सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का पालन न करने वाला पुरुष—शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान करते रहने पर भी कार्य में असफल होता है । अतएव यम और नियम दोनों की समान रूप से प्रतिष्ठा करनी चाहिये । कारण यह है कि ब्रह्मचर्य के ये दोनों आवश्यक अङ्ग हैं, या यों समझिये कि ब्रह्मचर्य रूपी आत्मा इन्हीं यम-नियमों से बने हुये शरीर में वास करता है ।

अब तो हमारे पाठक यम-नियम तथा ब्रह्मचर्य का सम्बन्ध भली भाँति समझ गये होंगे ।