भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

६३

यम-नियम और ब्रह्मचर्य

‘ईश्वर-प्रणिधान’ से समाधि ( अत्यन्त शान्ति ) मिलती है । आत्मा या परमात्मा में लीन होने पर कोई सुख फिर शेष नहीं रहता । यह सर्व-सम्मत सिद्धान्त है ।

यद्यपि यम और नियम योग के अङ्ग हैं, तथापि ये ‘ब्रह्मचर्य’ के भी प्रधान अवयव हैं । ब्रह्मचर्य की दशा में प्रत्येक ब्रह्मचारी को पाँच यमों और पाँच नियमों का पालन नितान्त आवश्यक है । विना इनके ब्रह्मचर्य की कदापि सिद्धि नहीं हो सकती है ।

धर्माचार्य मनु ने भी यम और नियमों के सम्बन्ध में अपनी ऐसी ही सम्मति प्रकट की है:—

यमान्सेवत सतर्त, न नित्यं नियमान्बुधः ।

यमान्यतत्यकुर्वीणो, नियमान्क्रेवलान्मज्जन ॥

( मनुस्मृति ) बुद्धिसान् सदैव यमों का सेवन करे, नियमों का पालन नित्य न भी करे, क्योंकि यमों का न पालन करने वाला मनुष्य केवल नियमों का पालन करता हुआ भी पतित हो जाता है ।

अभिप्राय यह है कि अहिंसा सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का पालन न करने वाला पुरुष—शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान करते रहने पर भी कार्य में असफल होता है । अतएव यम और नियम दोनों की समान रूप से प्रतिष्ठा करनी चाहिये । कारण यह है कि ब्रह्मचर्य के ये दोनों आवश्यक अङ्ग हैं, या यों समझिये कि ब्रह्मचर्य रूपी आत्मा इन्हीं यम-नियमों से बने हुये शरीर में वास करता है ।

अब तो हमारे पाठक यम-नियम तथा ब्रह्मचर्य का सम्बन्ध भली भाँति समझ गये होंगे ।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

६४

१७—यज्ञ और ब्रह्मचर्य

“यज्ञाद्भवति पर्जन्यः, पर्जन्यादन्तस्त्वभवः ।”

( मनुस्मृति )

यज्ञ से मेघ की उत्पत्ति होती है, और मेघ से अन्न पैदा होता है । और अन्न से सब जीते हैं ।

यज्ञ की महिमा वेदों में विविध प्रकार से गाई गई है । जिसके द्वारा (परमात्मा) ज्ञाना जाय, ज्ञानी उसे 'यज्ञ' कहते हैं । यही कारण है कि उपनिषदों में ब्रह्मचर्य का यज्ञ-रूप से वर्णन किया गया है ।

अथ यद्यद्य इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यं मेघ । तद् ब्रह्मचर्येण खेव यो ज्ञाता, तं विन्दुतेऽथ यद्विदमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यं मेघतद् ब्रह्मचर्येण खेवे । (ऽऽत्मानमनुविन्दुते ।

( छान्दोग्योपनिषद् )

जिसे 'यज्ञ' कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है । उस ब्रह्मचर्य का जानने वाला ब्रह्म को प्राप्त होता है । जिसको 'विन्दु' कहते हैं वह ब्रह्मचर्य ही है । ब्रह्मचर्य द्वारा यजन करके ही पुरुष ब्रह्म को पाता है ।

“लोग जिसे 'सात्रायण' यज्ञ कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य से ही अभिनाशी जीव की रक्षा होती है । जिसे 'भीन' कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य से ही परमात्मा का भजन किया जा सकता है । जिसे 'अनशनायन' कहा गया है, वह भी ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य से प्राप्त किया हुआ आत्मभाव नष्ट नहीं होता । जिसे 'अरण्यायन' कहते हैं, वह

६५

यज्ञ और ब्रह्मचर्य

भी ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा (कर्मकाण्ड और ज्ञान-काण्ड का फल) ब्रह्मपुरी मिलती है । जो पुरुष इस ब्रह्मचर्यरूपी यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं, वे अग्नि-स्वरूप होकर अपने तथा औरों के पापों को भी तृण की भाँति भस्म कर देते हैं ।”

एक स्थान पर ब्रह्मचर्य को यज्ञ मान कर ब्रह्मचारी को यज्ञकर्त्ता माना गया है । यज्ञ के प्रधान-प्रधान अङ्ग, ब्रह्मचारी के कार्यों पर, रूपकालङ्कार में, घटाये गये हैं । इसका अभिप्राय यह है कि ब्रह्मचर्य की अवस्था ही यज्ञ है । ब्रह्मचारी को यज्ञ करने की आवश्यकता नहीं, उसे तो यों ही यज्ञ का फल प्राप्त होता है ।

महर्षि अङ्गिरा के पुत्र चोरनामा ऋषि ने देवकी के पुत्र श्री कृष्ण से अध्ययन के समय कहा कि ब्रह्मचारी के लिये विशेष कर्म नहीं हैं । उसे मरणकाल में चाहिये कि इस प्रकार कह कर मुक्त हो जायः—

हे परमात्मन् ! आप ‘श्रुतिनाशी’ हैं । हे देव ! आप ‘पक्करस’ रहने वाले हैं, और आप ही ‘जीवनदाता तथा श्रुतिसुन्दरम्’ हैं । वस, इतने से ही उसकी सन्तुति हो जायगी । इसका अभिप्राय यह है । कि यही उसके लिये अन्तिम यज्ञ है । इसलिये इस उपदेश को सुन कर श्री कृष्ण भी अन्य विचारों को छोड़ कर परमात्मपरायण हो गये । अब यह बात भी सिद्ध हो गई कि ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ यज्ञ भी है । और ब्रह्मचारी ही यज्ञ कर्त्ता है ।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

६६

१८—दो आदर्श ब्रह्मचारी

‘ब्रह्मचारी सिद्धति सानौ रेतः। पृथिव्यां तेनजावन्ति प्रदि शश्वतत्तः।’

(अथर्ववेद)

ब्रह्मचारी अपने सद्वृत्तान्त, पराक्रम, सिद्धान्त, सदाचार तथा उत्तम गुणों को, वक्के-छोटे का विचार न कर, सब में फैलाता है। इससे चारों ओर की जनता में तब-जीवन का सञ्चार होता है।

हमारे पाठक इस बात को भली भाँति समझ चुके हैं कि ब्रह्मचर्य जैसे उच्च तथा सर्वोपकारी विज्ञान का पहले पहल इसी देश में आविष्कार हुआ था। यही कारण है कि अन्य देशों की अपेक्षा यहाँ इसका सुधार और प्रचार विशेष रूप से हुआ।

हमारे मत से भूमण्डल के इतिहास में जितने अधिक उदाहरण ब्रह्मचर्य के यहाँ मिल सकते हैं, उतने और कहीं मिलने सम्भव नहीं।

इस देश में अनेक पुरुषों ने ब्रह्मचर्य-पालन की चेष्टा की है। उनमें से कुछ लोग अपने व्रत से विंचलित भी हो गये। बहुतांश का सफलता भी मिला, पर हम उन दो आदर्श ब्रह्मचारियों का परिचय करा देना चाहते हैं, जो वास्तव में अद्वितीय हुये हैं। वे अपने उर्दौ ब्रह्मचर्य के प्रभाव से आज भी जनता के अन्ना-भाजन हो रहे हैं। समस्त भारत के आर्य-साहित्य में उन दोनों महावर्षाओं का व्यक्तिगत जीवन हमें अमूल्य शिक्षा प्रदान करता है।

इनमें से पहले ब्रह्मचारी का नाम जगद्विख्यात महावीर हर्यमान है। इनकी कथा रामायण में मिलती है। ये अपने जीवन

६७

दो आदर्श ब्रह्मचारी

पर्यन्त अलुएण ब्रह्मचारी रहे। इन्होंने अपने ब्रह्मचर्य का यहाँ तक पालन किया कि स्वप्न में भी कभी इनका वीर्य स्वलिप्त न होने पाया। ब्रह्मचर्य के प्रभाव से इनका शरीर वज्र के समान दृढ़-मुष्ट हो गया था। वे महावीर्य के प्रभाव से कठिन से कठिन कार्य कर सकते थे। इनके ब्रह्मचर्य का उद्देश्य केवल सेवा-कार्य था। इन्होंने वली से वली राक्षसों का मद्द चूर्ण कर डाला। अनुकरणीय स्वामि-भक्ति, असम पराक्रम, तेजस्वी स्वभाव और पवित्र अन्तःकरण के लिये भी ये परम प्रसिद्ध थे। इन गुणों से युक्त होने पर भी, वे बहुत बड़े विद्वान और मेधावी थे। वक्तूत्कला से दूसरों का हृदय अपनी ओर भली भाँति खींचना जानते थे।

एक स्थान पर किंकल्धा-काण्ड में श्रीरामचन्द्र भगवान् ने स्वयं अपने मुख से हनुमान को विद्वत्ता और वाक्-चातुरी की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। वह यों है:—

महावली वालि ने अपने भाई सुग्रीव को मार-पीट कर घर से निकाल दिया था। वे ऋष्यमुक्त पर्वत पर जाकर इन्हीं हनुमान के साथ रहने लगे थे। एक दिन श्रीरामजी जानकीजी को खोजते हुये लक्ष्मण के साथ उधर आ निकले। सुग्रीव के मन में सन्देह और भय हुआ। उसने इन्हे रहस्य लेने के लिये भेजा। हनुमान भी विप्ररूप धर कर श्रीराम और लक्ष्मण से मिले। उनके भाषण से प्रसन्न होकर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा:—

तमस्यमाप सौमित्रे ! सुग्रीव-सच्चिर् कपिम् । वाक्यम् मधुरैवाक्यैः, स्नेहयुक्तं मरिन्दमम् ॥ नानुग्वेदं विनीतस्य, नाथस्युर्वेदं धारिणः । नासातमेवद-विदुषः, शक्यमेव विभावितुम् ॥

ब्रह्मवर्ध-विज्ञान

६८

नूनं व्याकरणं कृत्स्नं मनोने बहुधा श्रुतम् । बहु व्याहरत्मानेन, न किञ्चिदपशब्दितम् ॥ न मुखेनेत्रयोश्चापि, ललाटे च ध्रुवोत्तथा । श्रान्येचपि च सर्वेषु, दोषः संपिदितः क्वचित् ॥ अविस्तरं मत्सनिर्गुणं मविलम्बितं मव्ययम् । उत्तर्यं कण्ठगे वाक्यं, वर्तते मध्यमस्वरम् ॥ संस्कार-क्रम-संपन्ना मद्रूता मविलम्बिताम् । उच्चारयति कल्याणीं, चाचं हृदय-हर्पिषीम् ॥

( वाल्मीकि-रामायण )

हे लक्ष्मण ! मधुर वाक्य से स्नेहयुक्त सुभीष के वाणी-विशारद सचिव हनुमान से भाषण कर, यह ज्ञात हुआ कि च्द्रवेद, यजुर्वेद और सामवेद के न जानने वाले इस प्रकार का भाषण नहीं कर सकते । अर्थात् ये वेद-शास्त्रज्ञ जान पड़ते हैं । निश्चय, ही इन्होंने व्याकरण का अच्छा अध्ययन किया है । कारण यह है कि इन्होंने इतना अधिक बोलने पर भी एक अक्षुद्धि नहीं की । मुख में, नेत्रों में और श्रुभाग में तथा अन्य किसी भी अवयव में इनके कहीं भी दोष नहीं दिखाई पड़ा ।

सूक्ष्म राति से, स्पष्ट-स्पष्ट, अखलित श्रुति-मधुर, न तो बहुत धीरे-धीरे और न बहुत जोर-जोर से, अर्थात् मध्यम स्वर में इन्होंने भाषण किया है । सुसंस्कृत नियमयुक्त, अद्भुत प्रकार से, भिन्न तथा हृदय को हर्षित करने वाली वाणी इनके मुख से उच्चरित हुई है ।

अब हम इनकी दृढ़ प्रतिज्ञता तथा पराक्रम-शीलता का परिचय इन्हीं के कहे हुये वाक्यों से कराते हैं:—

६९

दो आदरी ब्रह्मचारी

श्रीजानकी को खोजते हुये वानर लोग समुद्र-तीर पर पहुँचे । सबों ने समुद्र लाँघने के लिये अपने-अपने बल का बणन किया । जान्चवन्त ने देखा कि यिना हनुमान के काम न चलेगा । अतः उन्होंने उन्हें उत्कर्ष-वचनों द्वारा उत्साहित किया । इस पर हनुमान ने उत्तेजित होकर वानरी-सेना को इस प्रकार सन्तुष्ट किया:—

यथा राघव-निर्मुक्तः, शरः श्वसन-चिकमः । गच्छेत्सहस्रगमिष्यामि, लङ्कां रावणपालिताम् ॥ नहि द्रव्यामि यदितो, लङ्कायां जनकाम्बजाम् । श्रमेनैव हि वेगेन, गमिष्यामि छुरालयम् ॥ यद्विवात्रिदिषे स्तीर्ता, न द्रव्यामि कृतश्रमः ॥ यदृश्या राक्षस-राजान मानयिष्यामि रावणम् ॥ सर्वथा कृत कार्योऽह मेऽप्यामि सह सीतया । ज्ञानयिष्यामि वालङ्कां, समुत्पाद्य सरावणम् ॥

( वाल्मीकि रामायण )

जिस प्रकार श्रीरामचन्द्र का चलाया हुआ बाण सन-सन करता हुआ जाता है, उसी भाँति मैं रावण के द्वारा रक्षा की गई लङ्कापुरी में जाऊँगा । यदि मैं उस लङ्का में जानकी को न देखूँगा, तो उसी वेग से स्वर्ग में चला जाऊँगा । यदि मैं इतना परिश्रम करने पर भी त्रिलोक में सीता को न पा सकूँगा, तो मैं राक्षसों के राजा रावण को बाँध कर यहाँ ले आऊँगा, या तो मैं कृतकार्य होकर सीता के साथ आऊँगा, या लङ्का को भली भाँति नष्ट-भ्रष्ट करके रावण को साथ पकड़ ले आऊँगा ।

पाठकों ने एक आदरी ब्रह्मचारी का परिचय पा लिया । इनकी वाणी में कैसा तेज है ? अब हम दूसरे का परिचय कराते हैं ।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

७०

दूसरे ब्रह्मचारी का नाम भीष्म पितामह है। महाभारत के चरित-नायकों में ये प्रधान माने जाते हैं। इनका परम स्वारूप-त्याग उद्यम-धर्म-नीतिज्ञता, अद्भुत पराक्रम, शस्त्रास्त्र चलाने में निपुणता, युद्ध-कौशल, विपुल पाण्डित्य तथा उदार चरित्र प्रायः सब पर अवस्थात है।

ये भी बाल-ब्रह्मचारी थे। पहले इनका नाम 'देवव्रत' था, पर जब से इन्होंने अपने पिता के विवाह के लिये ब्रह्मचर्य की कठिन प्रतिज्ञा की, तब से लोग इन्हें 'भीष्म' कहने लगे।

इस महापुरुष के उन्नत व्यक्तित्व के सम्बन्ध में एक बहुत ही प्रचलित उक्त्य श्लोक है, उसे हम यहाँ देते हैं:—

भीष्मः सर्वं गुणोपेतः; ब्रह्मचारी दृढव्रतः। लोक-विश्रुत कीर्तिश्च, सख्यमर्गभूम्याहमतिः ॥

(दृष्टि)

भीष्म सर्व गुण-सम्पन्न, ब्रह्मचारी, दृढव्रती, धर्म के पालन करनेवाले, बुद्धिमान और संसार में बड़े यशस्वी पुरुष थे।

भीष्म की विमता ने वंश-विच्छेद होता हुआ देख कर, इनको विवाह कर लेने की आज्ञा दी। महर्षि व्यास ने भी ब्रह्मचर्य छोड़ कर, विवाह करने के लिये, बहुत प्रकार से समझाया। बहुत से लोगों ने इन्हें अपनी प्रतिज्ञा छोड़ने के लिये आग्रह किया, पर इस मनस्सा ने अपना प्रयत्न नहीं छोड़ा। जब सब लोग समझा कर हार गये, तब इन्होंने अन्त में अपने विचार की अटलता जिन ओजस्वी भावों में प्रकट किया, उन्हें यहाँ उद्धृत करते हैं:—

त्यजेच्छ पृथ्वी गन्धमापश्चरस मालमनः— व्योतिस्तथा त्यजेद्भूषं, वायुःस्पर्शगुणव्यजेत् ॥

७१

दो आदर्श ब्रह्मचारी

विक्रमं वृत्रहाजद्यादमै जहान्मच्च धर्मराट् । नत्वंहं सत्यमुत्तपट्टुं, व्ययसेयं कथञ्जन ॥

(महाभारत)

चाहे भूमि आपना गुण गन्ध छोड़ दे । जल अपना तरलत्व त्याग दे—सुय अपना तेज छोड़ दे—वायु अपना स्पर्श त्याग दे, इन्द्र पराक्रम रहित हो जाय, और धर्मराज धर्म से विमुख होकर रहें, पर मैं जिस ब्रह्मचर्य रूपी सत्य को, धारण कर चुका हूँ, उसे कदापि नहीं छोड़ सकता । इससे बढ़कर और क्या एक सत्य-शील ब्रह्मचारी कह सकता है !

ऊपर के दो आदर्श ब्रह्मचारियों के चरित्र से परम सुख देने वाले 'ब्रह्मचर्य' की महिमा भली भाँति प्रकट होती है । उनके समान यदि एक भी ब्रह्मचारी इस देश में हो जाय, तो उद्धार होने में रक्ष-मात्र सन्देह नहीं ।

अखण्ड ब्रह्मचर्य के पालन करने से ही हनुमान की वर-घर मूर्तियाँ स्थापित कर, पूजन होता है ।

इसी व्रत में सफल होने के कारण श्रीसीताजी के स्नेह-पात्र हुये और उन्हें यह आशीर्वाद मिला—

अजर-अमर गुणनिधि सुत होइ ।

करहि सदा रघुनायक छोइ ॥

(रामचरित मानस)

इसी सर्वोत्तम गुण के कारण श्रीरामचन्द्र जी श्रीमत् के समान श्रेष्ठ मानते रहे । और इसी के एक मात्र कारण से वे 'महावीर' पदवी से विभूषित हुये ।

अचल ब्रह्मचर्य के कारण ही भीष्म का नाम तर्पण में लिया जाता है ।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

७२

इसी के कारण वे इच्छा मरणीयुही और महाभारत के रणक्षेत्र में कोई भी उनका सामना न कर सका ।

अतएव महल की इच्छा रखने वाले पुरुषों को चाहिये कि इन दोनों सत्पुरुषों का अनुकरण कर, अपने को वैसा ही बनायें ।

१६---ब्रह्मचर्य के दो बड़े आचार्य

“आचार्यों ब्रह्मचर्येण, ब्रह्मचारिण निष्ठुते ।”

( भयर्वेद )

आचार्य अपने ब्रह्मचर्य के चल से ब्रह्मचारियों का हित करता है । अर्थात् योग्य बनाता है ।

‘आचार्यः परमः पिता ।’

( सूक्ति )

धार्मिक दृष्टि से आचार्य भी विद्यार्थी का परम पिता होता है ।

प्राचीन समय में ब्रह्मचर्य के अनेक आचार्य हो गये हैं । देव लोग तो ब्रह्मचर्य-श्रव के लिये प्रधान ही माने जाते थे, पर असुर लोग भी विद्वानों की कृपा से, इस महाश्रव का माहात्म्य जानते थे । आचार्यों का यही काम था कि वे स्वयं ब्रह्मचर्य के लिये दृढ़ सङ्कल्प रहते थे और अपने शिष्यों को भी इसका पाठ पढ़ा देते थे । इनमें महादेव भगवान् शङ्कर और दानव-गुरु शुक्र बहुत बड़े थे । अतएव हम इन दोनों के विषय में प्रथक्-प्रथक् वर्णन करते हैं ।

भगवान् शङ्कर परम योगी थे । ये ‘ब्रह्मचर्य’ के अधिष्ठाता

७३

महाचर्य के दो बड़े श्राचार्य

और शिक्क थे । सुर और असुर इनकी प्रसन्नता के लिये, और वर-दान प्राप्त करने की इच्छा से महाचर्य-व्रत का पालन करते, और वाञ्छित वर पाते थे ।

एक बार की बात है कि ये अपने महाचर्य-व्रत की दृढ़ता के लिये तपस्या कर रहे थे । इन्द्र ने कामदेव को इनके पास तपो-भङ्ग करने के लिये भेजा । वे भी कैलास में पहुँच कर, एक दृष्टि की ओट से अपना बाण, शङ्कर पर चलाये लगे । उनके मन में क्षोभ उत्पन्न हुआ । वे अपने योग-वल से इसका कारण समझ गये । उन्हें कामदेव के कपट-व्यवहार पर अत्यन्त क्रोध हुआ, और उन्होंने अपना प्रलयङ्कारी रूक्षीय नेत्र खोल दिया । इस घटना का उल्लेख महाकवि कालिदास ने बड़े ही उत्कर्ष-वर्द्धक प्रकार से 'कुमार-सम्भव' में किया है । उसे हम यहाँ देते हैं :—

क्रोधं प्रभो ! संहर संहरति ।

याचद् गिरा खे मरुतां चरन्ति ।

तावत्स्रं वक्षि भिष-नेष-जन्मा ।

भस्मावशेषं मदन स्त्रकार ॥

हे प्रभो ! अपने क्रोध को शान्त कीजिये ! शान्त कीजिये ! जब तक, ये शब्द आकाश-पथ में उँले, तब तक तो शिव के अप्र नेत्र से उत्पन्न—उस अग्नि ने, कामदेव को जला कर भस्म कर डाला, और हाहाकार मच गया । यह तो हुई एक कान्यमयी पौराणिक कथा । अब इसका आध्यात्मिक रहस्य भी सुनिये ! यह जानने ही योग्य है :—

मनुष्य का शरीर ही कैलास है । उसमें योगयुक्त रहने वाला वीर्यमय जीव ही 'शङ्कर' है । मनो-विकार ही 'कामदेव' है

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

७४

और विवेक ही दोष-नाराक 'तीसरा नेत्र'। ब्रह्मचर्य की अवस्था में मनो-विकार उसका अद्युष्टान भङ्ग करता चाहता है, परन्तु जब वह अपनी विवेक-दृष्टि से देखता है, तो यह उसकी काम-दासना तरङ्गण नष्ट हो जाती है।

प्राचीन समय में शुक्राचार्य नाम के एक असुरों के गुह्य थे। वे वीर्य-रक्षा के लिये अनेक उपाय बताते थे। एक बार उनकी शिष्यों को प्रहण कर दानव लोग बड़े वशित हो गये थे। अब तो उनसे देव लोग भी भय-भीत होने लगे। कहा जाता है कि इन आचार्य के पास 'सखीवनी' नाम की एक विद्या थी, जिससे ये सूतक को भी जीवित कर सकते थे। इसीलिये देवों ने अपने 'कच' नामक एक व्यक्ति को उनके पास यह अमौघ ज्ञान प्राप्त करने के लिये भेजा। शुक्राचार्य के प्रताप से इनको भी वह विद्या आ गई। यह सखीवनी-विद्या क्या था, जिसे कि केवल कच ने बड़े परिश्रम-द्वारा प्राप्त किया? वीर्य-रक्षा की प्रकाण्ड प्रणाली, जिन पर चलने से लोग सूतक होने से बच जाते थे। शुक्राचार्य ने एक बार कच को मरने से बचा भी लिया था। वह आख्यान आगे दिया जायगा।

अंब पाठक काम-नाशक 'रुतीय नेत्र' और 'सखीवनी-विद्या' का अद्भुत भेद समझ गये होंगे।

अम्ब्यास और वैद्यग्य नाम के दो नेत्र हैं। 'रुतीय नेत्र' जो कि मस्तिष्क में है, वह आत्मज्ञान है। उसके सुलने से काम का निर्मूल्य हो जाता है। शिव के पास यही नेत्र था। इसी लिये उन्होंने कामदेव को जला कर चार कर दिया। यदि तुम

७५

त्रिनेत्र और सखीवनी-विद्या

भी अपने मनोविकारों को जला कर, अपने को शङ्कर बनाता चाहते हो, तो इसी नेत्र को प्राप्त करने का उद्योग करो !

वीर्य की रक्षा करने वाली नियमावली का नाम 'सखीवनी-विद्या' है। जो इसे नहीं जानता, वह सुतक हो जाता है। अर्थात् अपने को विकारों से सुरक्षित नहीं रख सकता। वीर्य-नाश का ही नाम मृत्यु है, जो इस विद्या को नहीं जानता, वह अपने को इस मृत्यु से बचा नहीं सकता। यदि तुम इस शुक्र-संरक्षण-विधि को जानते हो, और इसका अभ्यास भी है, तो तुम स्वयं तो सुरक्षित हुई हो, परन्तु औरों को भी तुम सुतकल से जीवित कर सकते हो। यह तुम्हारे लिये सब से सुख की बात होगी।

ब्रह्मचारियों को चाहिये कि इन दोनों आचार्यों का अनुकरण करें। इन दोनों ने ब्रह्मचर्य-रक्षा के लिये, जो योग्यतायें प्राप्त की थीं, वे सब के लिये और सब कालों में, मनुष्य का हित कर सकती हैं। इन आचार्यों को अपना आचार्य मान कर, साधना में तत्पर हो जायें !

२०—त्रिनेत्र और सखीवनी-विद्या

न्यम्बकं यजामहे, सुगन्धिमुष्टिबर्धनम् । उर्वरुकमिववन्धनान्मृत्योर्मुञ्चयामासुतात् ॥

( बख्खंद )

हम तीन नेत्र धारण करने वाले उस शिव की उपासना करते हैं, जो ध्यानन्द और आनन्द की दृष्टि करते हैं। वे स्वर्ग नामक

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

७६

फल विरोध की भाँति हमें मृत्यु-बन्धन से मुक्त करें, और दीर्घ जीवन दें ।

“ह्येषा सृज्जीवनी-विद्या, सृज्जीवयति, मानवम् ।”

(सृष्टि)

यह सञ्जीवनी नाम की विद्या निश्चय-पूर्वक मनुष्य को भरने से रक्षित रखती है । इसीलिये इसका नाम सृज्जीवनी-पद्म है ।

हमारे मत से प्रत्येक पुरुष भगवान् शंकर और शुकचार्य बन सकता है । शङ्कर का अर्थ है—सुख-कारक । जो अपना तथा ससार का कल्याण करे, वह शङ्कर है । और शुकचार्य का अभि-प्राय है—वीर्य-रक्षक । जो स्वयं वीर्य का संरक्षण करे और संसार को भी वीर्य-रक्षा का उपदेश दे कर, सुधार ।

यह बात छोटे-बड़े प्रायः सभी लोग जानते हैं कि शङ्कर के पास ‘तीन नेत्र’ थे । खामाबिक दो नेत्रों के अतिरिक्त एक विभिन्न नेत्र उनके तलाट में था । इसे वे गुप्त रखते थे । जब जनता में तमोगुण की वृद्धि होती थी, तब वे इसे प्रकट कर, इस से संहार का काम लेते थे । कामदेव के आक्रमण करने पर, उन्होंने इसी के बल से उसे दण्ड कर अपने ब्रह्मचर्य का संरक्षण किया था । इसी नेत्र के कारण दोनों ने उन्हें अपना गुरु मान लिया था, और असुर-समूह उनसे सदा भय-भीत रहता था । यह नेत्र उन्हें मिला कहाँ से था ? ब्रह्मचर्ययुक्त योग-साधन से ! यह तीसरा नेत्र क्या था ?—आत्मज्ञान था !

यदि तुम शङ्कर बनना चाहते हो, तो इस तृतीय नेत्र को प्राप्त करने का प्रयत्न करो । विना इसके तुम अपने मनो-विकारों

७७

त्रिनेत्र और सखीवनी-विद्या

का कदोपि नाश नहीं कर सकते। मनोविकारों के नष्ट होने से ही मनुष्य अपना तथा संसार का हित कर सकता है। त्रिनेत्र हो जाने पर समस्त दुर्गुणों को भी नष्ट किया जा सकता है। इस प्रलयङ्कारी नेत्र का बड़ा माहात्म्य है। इसी के प्राप्त हो जाने से शिव 'मृत्युञ्जय' भी बन गये थे। तुम भी कामनाशक मृत्युञ्जय बन सकते हो ! इधके वल से तुम्हारा अखण्ड ब्रह्मचर्य तप कभी भ्रष्ट नहीं हो सकता।

यह बात हम पहले कह आये हैं कि शुक्ल के पास 'सखीवनी-विद्या' थी। इसी के प्रताप से वे असुरों को जीवित कर देते थे। असुर लोग उन्हें आचार्य मानते थे। उन्होंने इसी के प्रयोग से कच नाम के विद्यार्थी को जीवित कर दिया था।

कच बृहस्पतिके पुत्र थे ये सन्नीवनी विद्या सीखने के लिये शुक्ल के पास गये और ब्रह्मचर्य से रह कर विद्या सीखने का निवेदन किया। यह बात असुरों को ज्ञात हुई। इस पर वे जले और कच को मार डाला। पर शुक्लाचार्य ने उन्हें पुनः जीवित कर दिया।

यह सखीवनी-विद्या क्या थी ? वीर्य-संरक्षण की प्रणाली थी। असुरों ने कई बार कच को मार डाला था। इसका यही अभिप्राय है कि उसे अपने संसर्ग से वीर्य-नाशक—व्यभिचारी बना डाला था। हम कह चुके हैं कि वीर्य-नाश ही मृत्यु है। इसलिये शुक्ल ने कच को वीर्य-रक्षा के उपाय बता कर, उसे सचेत कर दिया। वह पुनः सदाचार से रहने लगा। इसी सखीवनी-विद्या के पा जाने से कच ने देवयानी जैसी सुन्दरी का चिरस्कार अन्त में कर दिया था।

अब पाठक 'त्रिनेत्र' और 'सखीवनी-विद्या' के उपाख्यानों

ब्रह्मचर्य विद्वान

७८

का रहस्य समझ गये होंगे। ब्रह्मचर्य से रहने वाले सदाचारी को 'देव' और वीर्य-नाश करने वाले दुश्चरित्र को 'असुर' समझना चाहिए।

त्रिनेत्र प्राप्त होने से ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है और सखी-वनी-विद्या से वीर्य-नाश से बहारा होता है। जो ब्रह्मचारी हैं, वे तो मनोविकारों का नाश कर सुरक्षित रहते हैं और जो न्य-भिचारी हैं, वे ब्रह्मचर्य से रहने के लिये उपाय खोजते हैं। अत-एव प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह त्रिनेत्र और सखीवनी-विद्या—दोनों को प्राप्त करे। त्रिनेत्र 'आत्मज्ञान' और सखीवनी विद्या—'वीर्य-रक्षा-प्रणाली' है। इन दोनों की प्राप्ति से देव और असुर—दोनों प्रकार के मनुष्यों का बहारा निश्चित है।

२१—अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त

सर्वं वेदात्मसिध्यति । 'प्रमाणं परमं श्रुतिः ।'

( यमक्षत्रपुण मनु )

सब कुछ वेद से सिद्ध होता है। कारण यह है कि वेद में सभी प्रकार के विषयों का संग्रह है।

सब से बढ़ कर प्रमाण वेद है। जिस बात का समर्थन वेद में है, वह अन्य ग्रन्थ के प्रमाणों की उपेक्षा नहीं करता।

“इदम्राप्त्यनिष्टपरिहारयोरलाकिक मुपार्थयो वेदयति स.वेदः।”

( साम्प्रकार वायुणाचार्य )

जो इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट के नाश करने का संदुपाय बतावे, उसे वेद कहते हैं।

७९

अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त

इस खण्ड में हम अनेक प्रकार के प्रमाणों और उदाहरणों से ब्रह्मचर्य का महत्व दिखला चुके हैं। अब हम इसे वेद में दिखलाना चाहते हैं। क्योंकि मानवो-सभ्यता के सर्व श्रेष्ठ ग्रन्थ वेद ही हैं।

ब्रह्मचर्य बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। वेद जैसे सार्वभौम ग्रन्थ में इसके आदर्शों की महिमा का वर्णन न होना अत्यन्त असम्भव है !

यों तो प्रायः सभी वैदिक ग्रन्थों में ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में कुछ न कुछ भाव प्रकट किया गया है, पर हमारे अथर्ववेद में तो एक सूक्त का सूक्त ही, इस महत्वपूर्ण विषय से परिपूर्ण है। इस सूक्त का नाम ही 'ब्रह्मचारी' या 'ब्रह्मचर्य-सूक्त' पढ़ गया है। इस सूक्त में सब २६ मन्त्र हैं। इनमें ब्रह्मचारी की महत्ता, कर्त्तव्यशीलता और व्यवहार-निष्ठा—ब्रह्मचर्य की महिमा, कार्यसिद्धि और व्यापकता, एवं आचार्य के धर्म, महत्त्व तथा उपदेश का वर्णन अलङ्कार-मयी भाषा में बड़े सार-गर्भित रूप से किया गया है। यह बड़े काम का है। यदि एक एक कर के भाव सहित सब मन्त्र कण्ठस्थ कर लिये जायें, तो बहुत ही लाभ पहुँच सकता है। पतदर्थ हम सम्पूर्ण सूक्त को अर्थ तथा भावार्थ सहित पाठकों के दिल की दृष्टि से लिख देना चाहते हैं।

आजकल वेदों का विज्ञान-युक्त अर्थ करने वाले बहुत ही कम लोग हैं। इसीलिये अन्गोल अर्थों से लोगों में केवल भ्रम फैल जाता है, और लाभ कुछ नहीं होता। वेदों की साधा अपौरुषेय है, इसलिये देश, काल और पात्र के अनुकूल एक ही श्रृंखा के कई अर्थ हो जाते हैं। पण्डितवर रामण, महीधर, सायण-

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

८०

चार्य, शङ्कराचार्य और स्वामी दयानन्द—जितने भाष्यकार हुये हैं, प्रायः सर्वोंने अपने-अपने मन के अनुकूल अर्थ किया है। 'ऋग्वेद-भाष्य-भूमिका' में पुराने भाष्यों की अनर्थता और उनके भ्रमों का युक्ति-युक्त खण्डन किया गया है और यह बात सिद्ध की गई है कि वेद में विज्ञान-विरुद्ध अर्थ हैं ही नहीं।

हम इस ब्रह्मचर्य-सूक्त का वास्तविक अर्थ काशी के एक विद्वान्-वेदङ्ग-ब्राह्मण से सम्मन्ना चाहते थे, पर खेद है, वे इस कार्य में असमर्थ ज्ञात हुये। और उन्होंने यह भी कहा कि यहाँ की पण्डितमण्डली तो वही पुराना अर्थ करेगी। अतः हमने स्वयं परिश्रम कर, सुसङ्गत भावों के निकालने की चेष्टा की। और उसी पर संतोष किया, चन्हें पाठक स्वयं आगे देखेंगे :—

ब्रह्मचर्य-सूक्त

( १ )

ब्रह्मचारी षांख्यरति रोदसी उभे तस्मिन्देवाः सम्मनसो प्रवर्तत । स द्वाधार प्रथिवीं दिवञ्च स आचार्यं तपसा पिपत्ति ॥

( १ ) ब्रह्मचारी प्रथिवी और आकाश को वश में करता हुआ चलता है। ( २ ) उसमें देव लोग मन के साथ रहते हैं।

( ३ ) वह प्रथिवी और आकाश को धारण करता है और ( ४ ) वह आचार्य को तप से पूर्ण करता है।

( १ ) ब्रह्मचारी ऐहिक और पारलौकिक वस्तुतियों को अपने अधिकार में करने के लिये, सदैव उपयोग करता है।

८९

अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त

( २ ) इस व्योग-साधन से उसके हृदय में सदगुणों का आविर्भाव होता है।

( ३ ) प्राप्त दिव्य गुणों के प्रभाव से, वह ऊपर के दोनों उच्च उद्देश्यों को प्राप्त करने में दृढ़ हो जाता है।

( ४ ) और इस प्रकार वह योग्य बनकर अच्छी योग्यता से अपने आचार्य को पूर्ण-काम करता है।

ब्रह्मचारी ऐहिक और पारलौकिक सुखों को साधने वाली विद्या का भली भाँति अध्ययन करता है। ज्यों ज्यों अध्ययन करता है, त्यों त्यों उसके हृदय में उत्तम ज्ञान प्राप्त होता है। कुछ समय के अनन्तर, वह विद्वान् बन जाता है, और वह अपने आचार्य के निरन्तर के परिश्रम को भी इस प्रकार सफल करता है।

( २ )

ब्रह्मचारिणं पितरौ देवजनाः

पुण्यदेवा अनुसंयन्ति सर्वै ।

गन्धर्वा एनमन्वायन् वयर्हिश्वत् त्रिशताः ।

पट्सहस्राः सर्वान्तस् देवास्तपसा पिपलि ॥

( १ ) ब्रह्मचारी को पितर, देवजन, अन्य देव और गन्धर्व, सभी लोग अनुसरते हैं। ( २ ) वह अपने तप से ३०, ३०० और ६००० देवों को परिपूर्ण करता है।

( १ ) ब्रह्मचारी के पिता-पितामहदि, झुमैपै पुरवासी तथा गुणशाली लोग, सभी उसका कल्याण चाहते हैं।

( २ ) और वह अपने अनुष्ठान से सर्वज्ञ की दिव्य शक्तियों को विकसित करता है।

ब्रह्मचारी के सभी हितैषी (चाहने वाले) उसकी आशा लगाने

ब्रह्मचर्य-विद्यान

८२

रहते हैं कि वह अपने व्रत से विचलित न होने पावे । जब उसका ब्रह्मचर्य पूर्ण हो जाता है, और वह विद्या पढ़ लेता है, तब उसका मानसिक और शारीरिक विकास होता है ।

इस मन्त्र में जो देवों की संख्या गिनाई गई है । उसका अभिप्राय यह है कि इस शरीर में भी सब देवों के अंश हैं । एक भी अङ्ग ऐसा नहीं, जिसमें कि एक न एक प्रकार की दैवी ( प्राकृतिक ) शक्ति न हो । चन्द्रों के आधार पर भव्य जीवित रहता है । चन्द्रों तीन, तीस, तीन सौ और छः सहस्र—गुण, धर्म, योग्यता और विषय के मूल को देव नाम से अभिहित किया ।

( ३ )

आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्त्रः । तं रात्रौ त्विस्त्वं उदरे विमर्शितं तं जातं द्रष्टुम मिसंन्यस्त देवाः ॥

(१) ब्रह्मचारी को प्राप्त करने वाला आचार्य, उसे अन्तर्गत करता है (२) उसे तीन रात तक अपने उदर में रखता है और (३) उसके उत्पन्न होने पर देव-गण उसे देखने आते हैं ।

(१) आचार्य अपने यहाँ आये हुये ब्रह्मचारी को अपने अधिकार में कर लेता है । वह विना आचार्य की आज्ञा, कुछ भी नहीं कर सकता । अर्थात् ब्रह्मचारी से आज्ञा-पालन करवना है ।

(२) जब तक उस ब्रह्मचारी के त्रिविध अद्यान दूर नहीं हो जाते, तब तक वह उसे अपने संरक्षण में रखता है ।

(३) जब वह सुबोध हो जाता है—उसकी बुद्धि परिपक्व हो जाती है, तब आचार्य उसे अपने वन्यन से मुक्त कर देता है । फिर विद्वान् लोग उसका आदर-सत्कार करते हैं ।

उपनयन-संस्कार के हो जाने पर, ब्रह्मचारी अपने आचार्य के