भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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यज्ञ और ब्रह्मचर्य

भी ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य के द्वारा (कर्मकाण्ड और ज्ञान-काण्ड का फल) ब्रह्मपुरी मिलती है । जो पुरुष इस ब्रह्मचर्यरूपी यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं, वे अग्नि-स्वरूप होकर अपने तथा औरों के पापों को भी तृण की भाँति भस्म कर देते हैं ।”

एक स्थान पर ब्रह्मचर्य को यज्ञ मान कर ब्रह्मचारी को यज्ञकर्त्ता माना गया है । यज्ञ के प्रधान-प्रधान अङ्ग, ब्रह्मचारी के कार्यों पर, रूपकालङ्कार में, घटाये गये हैं । इसका अभिप्राय यह है कि ब्रह्मचर्य की अवस्था ही यज्ञ है । ब्रह्मचारी को यज्ञ करने की आवश्यकता नहीं, उसे तो यों ही यज्ञ का फल प्राप्त होता है ।

महर्षि अङ्गिरा के पुत्र चोरनामा ऋषि ने देवकी के पुत्र श्री कृष्ण से अध्ययन के समय कहा कि ब्रह्मचारी के लिये विशेष कर्म नहीं हैं । उसे मरणकाल में चाहिये कि इस प्रकार कह कर मुक्त हो जायः—

हे परमात्मन् ! आप ‘श्रुतिनाशी’ हैं । हे देव ! आप ‘पक्करस’ रहने वाले हैं, और आप ही ‘जीवनदाता तथा श्रुतिसुन्दरम्’ हैं । वस, इतने से ही उसकी सन्तुति हो जायगी । इसका अभिप्राय यह है । कि यही उसके लिये अन्तिम यज्ञ है । इसलिये इस उपदेश को सुन कर श्री कृष्ण भी अन्य विचारों को छोड़ कर परमात्मपरायण हो गये । अब यह बात भी सिद्ध हो गई कि ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ यज्ञ भी है । और ब्रह्मचारी ही यज्ञ कर्त्ता है ।