भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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१७—यज्ञ और ब्रह्मचर्य

“यज्ञाद्भवति पर्जन्यः, पर्जन्यादन्तस्त्वभवः ।”

( मनुस्मृति )

यज्ञ से मेघ की उत्पत्ति होती है, और मेघ से अन्न पैदा होता है । और अन्न से सब जीते हैं ।

यज्ञ की महिमा वेदों में विविध प्रकार से गाई गई है । जिसके द्वारा (परमात्मा) ज्ञाना जाय, ज्ञानी उसे 'यज्ञ' कहते हैं । यही कारण है कि उपनिषदों में ब्रह्मचर्य का यज्ञ-रूप से वर्णन किया गया है ।

अथ यद्यद्य इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यं मेघ । तद् ब्रह्मचर्येण खेव यो ज्ञाता, तं विन्दुतेऽथ यद्विदमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यं मेघतद् ब्रह्मचर्येण खेवे । (ऽऽत्मानमनुविन्दुते ।

( छान्दोग्योपनिषद् )

जिसे 'यज्ञ' कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है । उस ब्रह्मचर्य का जानने वाला ब्रह्म को प्राप्त होता है । जिसको 'विन्दु' कहते हैं वह ब्रह्मचर्य ही है । ब्रह्मचर्य द्वारा यजन करके ही पुरुष ब्रह्म को पाता है ।

“लोग जिसे 'सात्रायण' यज्ञ कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य से ही अभिनाशी जीव की रक्षा होती है । जिसे 'भीन' कहते हैं, वह ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य से ही परमात्मा का भजन किया जा सकता है । जिसे 'अनशनायन' कहा गया है, वह भी ब्रह्मचर्य ही है । क्योंकि ब्रह्मचर्य से प्राप्त किया हुआ आत्मभाव नष्ट नहीं होता । जिसे 'अरण्यायन' कहते हैं, वह