भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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१८—दो आदर्श ब्रह्मचारी

‘ब्रह्मचारी सिद्धति सानौ रेतः। पृथिव्यां तेनजावन्ति प्रदि शश्वतत्तः।’

(अथर्ववेद)

ब्रह्मचारी अपने सद्वृत्तान्त, पराक्रम, सिद्धान्त, सदाचार तथा उत्तम गुणों को, वक्के-छोटे का विचार न कर, सब में फैलाता है। इससे चारों ओर की जनता में तब-जीवन का सञ्चार होता है।

हमारे पाठक इस बात को भली भाँति समझ चुके हैं कि ब्रह्मचर्य जैसे उच्च तथा सर्वोपकारी विज्ञान का पहले पहल इसी देश में आविष्कार हुआ था। यही कारण है कि अन्य देशों की अपेक्षा यहाँ इसका सुधार और प्रचार विशेष रूप से हुआ।

हमारे मत से भूमण्डल के इतिहास में जितने अधिक उदाहरण ब्रह्मचर्य के यहाँ मिल सकते हैं, उतने और कहीं मिलने सम्भव नहीं।

इस देश में अनेक पुरुषों ने ब्रह्मचर्य-पालन की चेष्टा की है। उनमें से कुछ लोग अपने व्रत से विंचलित भी हो गये। बहुतांश का सफलता भी मिला, पर हम उन दो आदर्श ब्रह्मचारियों का परिचय करा देना चाहते हैं, जो वास्तव में अद्वितीय हुये हैं। वे अपने उर्दौ ब्रह्मचर्य के प्रभाव से आज भी जनता के अन्ना-भाजन हो रहे हैं। समस्त भारत के आर्य-साहित्य में उन दोनों महावर्षाओं का व्यक्तिगत जीवन हमें अमूल्य शिक्षा प्रदान करता है।

इनमें से पहले ब्रह्मचारी का नाम जगद्विख्यात महावीर हर्यमान है। इनकी कथा रामायण में मिलती है। ये अपने जीवन