ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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दो आदर्श ब्रह्मचारी
पर्यन्त अलुएण ब्रह्मचारी रहे। इन्होंने अपने ब्रह्मचर्य का यहाँ तक पालन किया कि स्वप्न में भी कभी इनका वीर्य स्वलिप्त न होने पाया। ब्रह्मचर्य के प्रभाव से इनका शरीर वज्र के समान दृढ़-मुष्ट हो गया था। वे महावीर्य के प्रभाव से कठिन से कठिन कार्य कर सकते थे। इनके ब्रह्मचर्य का उद्देश्य केवल सेवा-कार्य था। इन्होंने वली से वली राक्षसों का मद्द चूर्ण कर डाला। अनुकरणीय स्वामि-भक्ति, असम पराक्रम, तेजस्वी स्वभाव और पवित्र अन्तःकरण के लिये भी ये परम प्रसिद्ध थे। इन गुणों से युक्त होने पर भी, वे बहुत बड़े विद्वान और मेधावी थे। वक्तूत्कला से दूसरों का हृदय अपनी ओर भली भाँति खींचना जानते थे।
एक स्थान पर किंकल्धा-काण्ड में श्रीरामचन्द्र भगवान् ने स्वयं अपने मुख से हनुमान को विद्वत्ता और वाक्-चातुरी की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। वह यों है:—
महावली वालि ने अपने भाई सुग्रीव को मार-पीट कर घर से निकाल दिया था। वे ऋष्यमुक्त पर्वत पर जाकर इन्हीं हनुमान के साथ रहने लगे थे। एक दिन श्रीरामजी जानकीजी को खोजते हुये लक्ष्मण के साथ उधर आ निकले। सुग्रीव के मन में सन्देह और भय हुआ। उसने इन्हे रहस्य लेने के लिये भेजा। हनुमान भी विप्ररूप धर कर श्रीराम और लक्ष्मण से मिले। उनके भाषण से प्रसन्न होकर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा:—
तमस्यमाप सौमित्रे ! सुग्रीव-सच्चिर् कपिम् । वाक्यम् मधुरैवाक्यैः, स्नेहयुक्तं मरिन्दमम् ॥ नानुग्वेदं विनीतस्य, नाथस्युर्वेदं धारिणः । नासातमेवद-विदुषः, शक्यमेव विभावितुम् ॥