भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मवर्ध-विज्ञान

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नूनं व्याकरणं कृत्स्नं मनोने बहुधा श्रुतम् । बहु व्याहरत्मानेन, न किञ्चिदपशब्दितम् ॥ न मुखेनेत्रयोश्चापि, ललाटे च ध्रुवोत्तथा । श्रान्येचपि च सर्वेषु, दोषः संपिदितः क्वचित् ॥ अविस्तरं मत्सनिर्गुणं मविलम्बितं मव्ययम् । उत्तर्यं कण्ठगे वाक्यं, वर्तते मध्यमस्वरम् ॥ संस्कार-क्रम-संपन्ना मद्रूता मविलम्बिताम् । उच्चारयति कल्याणीं, चाचं हृदय-हर्पिषीम् ॥

( वाल्मीकि-रामायण )

हे लक्ष्मण ! मधुर वाक्य से स्नेहयुक्त सुभीष के वाणी-विशारद सचिव हनुमान से भाषण कर, यह ज्ञात हुआ कि च्द्रवेद, यजुर्वेद और सामवेद के न जानने वाले इस प्रकार का भाषण नहीं कर सकते । अर्थात् ये वेद-शास्त्रज्ञ जान पड़ते हैं । निश्चय, ही इन्होंने व्याकरण का अच्छा अध्ययन किया है । कारण यह है कि इन्होंने इतना अधिक बोलने पर भी एक अक्षुद्धि नहीं की । मुख में, नेत्रों में और श्रुभाग में तथा अन्य किसी भी अवयव में इनके कहीं भी दोष नहीं दिखाई पड़ा ।

सूक्ष्म राति से, स्पष्ट-स्पष्ट, अखलित श्रुति-मधुर, न तो बहुत धीरे-धीरे और न बहुत जोर-जोर से, अर्थात् मध्यम स्वर में इन्होंने भाषण किया है । सुसंस्कृत नियमयुक्त, अद्भुत प्रकार से, भिन्न तथा हृदय को हर्षित करने वाली वाणी इनके मुख से उच्चरित हुई है ।

अब हम इनकी दृढ़ प्रतिज्ञता तथा पराक्रम-शीलता का परिचय इन्हीं के कहे हुये वाक्यों से कराते हैं:—