भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 380 में से

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दो आदरी ब्रह्मचारी

श्रीजानकी को खोजते हुये वानर लोग समुद्र-तीर पर पहुँचे । सबों ने समुद्र लाँघने के लिये अपने-अपने बल का बणन किया । जान्चवन्त ने देखा कि यिना हनुमान के काम न चलेगा । अतः उन्होंने उन्हें उत्कर्ष-वचनों द्वारा उत्साहित किया । इस पर हनुमान ने उत्तेजित होकर वानरी-सेना को इस प्रकार सन्तुष्ट किया:—

यथा राघव-निर्मुक्तः, शरः श्वसन-चिकमः । गच्छेत्सहस्रगमिष्यामि, लङ्कां रावणपालिताम् ॥ नहि द्रव्यामि यदितो, लङ्कायां जनकाम्बजाम् । श्रमेनैव हि वेगेन, गमिष्यामि छुरालयम् ॥ यद्विवात्रिदिषे स्तीर्ता, न द्रव्यामि कृतश्रमः ॥ यदृश्या राक्षस-राजान मानयिष्यामि रावणम् ॥ सर्वथा कृत कार्योऽह मेऽप्यामि सह सीतया । ज्ञानयिष्यामि वालङ्कां, समुत्पाद्य सरावणम् ॥

( वाल्मीकि रामायण )

जिस प्रकार श्रीरामचन्द्र का चलाया हुआ बाण सन-सन करता हुआ जाता है, उसी भाँति मैं रावण के द्वारा रक्षा की गई लङ्कापुरी में जाऊँगा । यदि मैं उस लङ्का में जानकी को न देखूँगा, तो उसी वेग से स्वर्ग में चला जाऊँगा । यदि मैं इतना परिश्रम करने पर भी त्रिलोक में सीता को न पा सकूँगा, तो मैं राक्षसों के राजा रावण को बाँध कर यहाँ ले आऊँगा, या तो मैं कृतकार्य होकर सीता के साथ आऊँगा, या लङ्का को भली भाँति नष्ट-भ्रष्ट करके रावण को साथ पकड़ ले आऊँगा ।

पाठकों ने एक आदरी ब्रह्मचारी का परिचय पा लिया । इनकी वाणी में कैसा तेज है ? अब हम दूसरे का परिचय कराते हैं ।