भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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दूसरे ब्रह्मचारी का नाम भीष्म पितामह है। महाभारत के चरित-नायकों में ये प्रधान माने जाते हैं। इनका परम स्वारूप-त्याग उद्यम-धर्म-नीतिज्ञता, अद्भुत पराक्रम, शस्त्रास्त्र चलाने में निपुणता, युद्ध-कौशल, विपुल पाण्डित्य तथा उदार चरित्र प्रायः सब पर अवस्थात है।

ये भी बाल-ब्रह्मचारी थे। पहले इनका नाम 'देवव्रत' था, पर जब से इन्होंने अपने पिता के विवाह के लिये ब्रह्मचर्य की कठिन प्रतिज्ञा की, तब से लोग इन्हें 'भीष्म' कहने लगे।

इस महापुरुष के उन्नत व्यक्तित्व के सम्बन्ध में एक बहुत ही प्रचलित उक्त्य श्लोक है, उसे हम यहाँ देते हैं:—

भीष्मः सर्वं गुणोपेतः; ब्रह्मचारी दृढव्रतः। लोक-विश्रुत कीर्तिश्च, सख्यमर्गभूम्याहमतिः ॥

(दृष्टि)

भीष्म सर्व गुण-सम्पन्न, ब्रह्मचारी, दृढव्रती, धर्म के पालन करनेवाले, बुद्धिमान और संसार में बड़े यशस्वी पुरुष थे।

भीष्म की विमता ने वंश-विच्छेद होता हुआ देख कर, इनको विवाह कर लेने की आज्ञा दी। महर्षि व्यास ने भी ब्रह्मचर्य छोड़ कर, विवाह करने के लिये, बहुत प्रकार से समझाया। बहुत से लोगों ने इन्हें अपनी प्रतिज्ञा छोड़ने के लिये आग्रह किया, पर इस मनस्सा ने अपना प्रयत्न नहीं छोड़ा। जब सब लोग समझा कर हार गये, तब इन्होंने अन्त में अपने विचार की अटलता जिन ओजस्वी भावों में प्रकट किया, उन्हें यहाँ उद्धृत करते हैं:—

त्यजेच्छ पृथ्वी गन्धमापश्चरस मालमनः— व्योतिस्तथा त्यजेद्भूषं, वायुःस्पर्शगुणव्यजेत् ॥