भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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दो आदर्श ब्रह्मचारी

विक्रमं वृत्रहाजद्यादमै जहान्मच्च धर्मराट् । नत्वंहं सत्यमुत्तपट्टुं, व्ययसेयं कथञ्जन ॥

(महाभारत)

चाहे भूमि आपना गुण गन्ध छोड़ दे । जल अपना तरलत्व त्याग दे—सुय अपना तेज छोड़ दे—वायु अपना स्पर्श त्याग दे, इन्द्र पराक्रम रहित हो जाय, और धर्मराज धर्म से विमुख होकर रहें, पर मैं जिस ब्रह्मचर्य रूपी सत्य को, धारण कर चुका हूँ, उसे कदापि नहीं छोड़ सकता । इससे बढ़कर और क्या एक सत्य-शील ब्रह्मचारी कह सकता है !

ऊपर के दो आदर्श ब्रह्मचारियों के चरित्र से परम सुख देने वाले 'ब्रह्मचर्य' की महिमा भली भाँति प्रकट होती है । उनके समान यदि एक भी ब्रह्मचारी इस देश में हो जाय, तो उद्धार होने में रक्ष-मात्र सन्देह नहीं ।

अखण्ड ब्रह्मचर्य के पालन करने से ही हनुमान की वर-घर मूर्तियाँ स्थापित कर, पूजन होता है ।

इसी व्रत में सफल होने के कारण श्रीसीताजी के स्नेह-पात्र हुये और उन्हें यह आशीर्वाद मिला—

अजर-अमर गुणनिधि सुत होइ ।

करहि सदा रघुनायक छोइ ॥

(रामचरित मानस)

इसी सर्वोत्तम गुण के कारण श्रीरामचन्द्र जी श्रीमत् के समान श्रेष्ठ मानते रहे । और इसी के एक मात्र कारण से वे 'महावीर' पदवी से विभूषित हुये ।

अचल ब्रह्मचर्य के कारण ही भीष्म का नाम तर्पण में लिया जाता है ।