ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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इसी के कारण वे इच्छा मरणीयुही और महाभारत के रणक्षेत्र में कोई भी उनका सामना न कर सका ।
अतएव महल की इच्छा रखने वाले पुरुषों को चाहिये कि इन दोनों सत्पुरुषों का अनुकरण कर, अपने को वैसा ही बनायें ।
१६---ब्रह्मचर्य के दो बड़े आचार्य
“आचार्यों ब्रह्मचर्येण, ब्रह्मचारिण निष्ठुते ।”
( भयर्वेद )
आचार्य अपने ब्रह्मचर्य के चल से ब्रह्मचारियों का हित करता है । अर्थात् योग्य बनाता है ।
‘आचार्यः परमः पिता ।’
( सूक्ति )
धार्मिक दृष्टि से आचार्य भी विद्यार्थी का परम पिता होता है ।
प्राचीन समय में ब्रह्मचर्य के अनेक आचार्य हो गये हैं । देव लोग तो ब्रह्मचर्य-श्रव के लिये प्रधान ही माने जाते थे, पर असुर लोग भी विद्वानों की कृपा से, इस महाश्रव का माहात्म्य जानते थे । आचार्यों का यही काम था कि वे स्वयं ब्रह्मचर्य के लिये दृढ़ सङ्कल्प रहते थे और अपने शिष्यों को भी इसका पाठ पढ़ा देते थे । इनमें महादेव भगवान् शङ्कर और दानव-गुरु शुक्र बहुत बड़े थे । अतएव हम इन दोनों के विषय में प्रथक्-प्रथक् वर्णन करते हैं ।
भगवान् शङ्कर परम योगी थे । ये ‘ब्रह्मचर्य’ के अधिष्ठाता