भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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महाचर्य के दो बड़े श्राचार्य

और शिक्क थे । सुर और असुर इनकी प्रसन्नता के लिये, और वर-दान प्राप्त करने की इच्छा से महाचर्य-व्रत का पालन करते, और वाञ्छित वर पाते थे ।

एक बार की बात है कि ये अपने महाचर्य-व्रत की दृढ़ता के लिये तपस्या कर रहे थे । इन्द्र ने कामदेव को इनके पास तपो-भङ्ग करने के लिये भेजा । वे भी कैलास में पहुँच कर, एक दृष्टि की ओट से अपना बाण, शङ्कर पर चलाये लगे । उनके मन में क्षोभ उत्पन्न हुआ । वे अपने योग-वल से इसका कारण समझ गये । उन्हें कामदेव के कपट-व्यवहार पर अत्यन्त क्रोध हुआ, और उन्होंने अपना प्रलयङ्कारी रूक्षीय नेत्र खोल दिया । इस घटना का उल्लेख महाकवि कालिदास ने बड़े ही उत्कर्ष-वर्द्धक प्रकार से 'कुमार-सम्भव' में किया है । उसे हम यहाँ देते हैं :—

क्रोधं प्रभो ! संहर संहरति ।

याचद् गिरा खे मरुतां चरन्ति ।

तावत्स्रं वक्षि भिष-नेष-जन्मा ।

भस्मावशेषं मदन स्त्रकार ॥

हे प्रभो ! अपने क्रोध को शान्त कीजिये ! शान्त कीजिये ! जब तक, ये शब्द आकाश-पथ में उँले, तब तक तो शिव के अप्र नेत्र से उत्पन्न—उस अग्नि ने, कामदेव को जला कर भस्म कर डाला, और हाहाकार मच गया । यह तो हुई एक कान्यमयी पौराणिक कथा । अब इसका आध्यात्मिक रहस्य भी सुनिये ! यह जानने ही योग्य है :—

मनुष्य का शरीर ही कैलास है । उसमें योगयुक्त रहने वाला वीर्यमय जीव ही 'शङ्कर' है । मनो-विकार ही 'कामदेव' है