भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 77

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

७४

और विवेक ही दोष-नाराक 'तीसरा नेत्र'। ब्रह्मचर्य की अवस्था में मनो-विकार उसका अद्युष्टान भङ्ग करता चाहता है, परन्तु जब वह अपनी विवेक-दृष्टि से देखता है, तो यह उसकी काम-दासना तरङ्गण नष्ट हो जाती है।

प्राचीन समय में शुक्राचार्य नाम के एक असुरों के गुह्य थे। वे वीर्य-रक्षा के लिये अनेक उपाय बताते थे। एक बार उनकी शिष्यों को प्रहण कर दानव लोग बड़े वशित हो गये थे। अब तो उनसे देव लोग भी भय-भीत होने लगे। कहा जाता है कि इन आचार्य के पास 'सखीवनी' नाम की एक विद्या थी, जिससे ये सूतक को भी जीवित कर सकते थे। इसीलिये देवों ने अपने 'कच' नामक एक व्यक्ति को उनके पास यह अमौघ ज्ञान प्राप्त करने के लिये भेजा। शुक्राचार्य के प्रताप से इनको भी वह विद्या आ गई। यह सखीवनी-विद्या क्या था, जिसे कि केवल कच ने बड़े परिश्रम-द्वारा प्राप्त किया? वीर्य-रक्षा की प्रकाण्ड प्रणाली, जिन पर चलने से लोग सूतक होने से बच जाते थे। शुक्राचार्य ने एक बार कच को मरने से बचा भी लिया था। वह आख्यान आगे दिया जायगा।

अंब पाठक काम-नाशक 'रुतीय नेत्र' और 'सखीवनी-विद्या' का अद्भुत भेद समझ गये होंगे।

अम्ब्यास और वैद्यग्य नाम के दो नेत्र हैं। 'रुतीय नेत्र' जो कि मस्तिष्क में है, वह आत्मज्ञान है। उसके सुलने से काम का निर्मूल्य हो जाता है। शिव के पास यही नेत्र था। इसी लिये उन्होंने कामदेव को जला कर चार कर दिया। यदि तुम