ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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त्रिनेत्र और सखीवनी-विद्या
भी अपने मनोविकारों को जला कर, अपने को शङ्कर बनाता चाहते हो, तो इसी नेत्र को प्राप्त करने का उद्योग करो !
वीर्य की रक्षा करने वाली नियमावली का नाम 'सखीवनी-विद्या' है। जो इसे नहीं जानता, वह सुतक हो जाता है। अर्थात् अपने को विकारों से सुरक्षित नहीं रख सकता। वीर्य-नाश का ही नाम मृत्यु है, जो इस विद्या को नहीं जानता, वह अपने को इस मृत्यु से बचा नहीं सकता। यदि तुम इस शुक्र-संरक्षण-विधि को जानते हो, और इसका अभ्यास भी है, तो तुम स्वयं तो सुरक्षित हुई हो, परन्तु औरों को भी तुम सुतकल से जीवित कर सकते हो। यह तुम्हारे लिये सब से सुख की बात होगी।
ब्रह्मचारियों को चाहिये कि इन दोनों आचार्यों का अनुकरण करें। इन दोनों ने ब्रह्मचर्य-रक्षा के लिये, जो योग्यतायें प्राप्त की थीं, वे सब के लिये और सब कालों में, मनुष्य का हित कर सकती हैं। इन आचार्यों को अपना आचार्य मान कर, साधना में तत्पर हो जायें !
२०—त्रिनेत्र और सखीवनी-विद्या
न्यम्बकं यजामहे, सुगन्धिमुष्टिबर्धनम् । उर्वरुकमिववन्धनान्मृत्योर्मुञ्चयामासुतात् ॥
( बख्खंद )
हम तीन नेत्र धारण करने वाले उस शिव की उपासना करते हैं, जो ध्यानन्द और आनन्द की दृष्टि करते हैं। वे स्वर्ग नामक