भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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फल विरोध की भाँति हमें मृत्यु-बन्धन से मुक्त करें, और दीर्घ जीवन दें ।

“ह्येषा सृज्जीवनी-विद्या, सृज्जीवयति, मानवम् ।”

(सृष्टि)

यह सञ्जीवनी नाम की विद्या निश्चय-पूर्वक मनुष्य को भरने से रक्षित रखती है । इसीलिये इसका नाम सृज्जीवनी-पद्म है ।

हमारे मत से प्रत्येक पुरुष भगवान् शंकर और शुकचार्य बन सकता है । शङ्कर का अर्थ है—सुख-कारक । जो अपना तथा ससार का कल्याण करे, वह शङ्कर है । और शुकचार्य का अभि-प्राय है—वीर्य-रक्षक । जो स्वयं वीर्य का संरक्षण करे और संसार को भी वीर्य-रक्षा का उपदेश दे कर, सुधार ।

यह बात छोटे-बड़े प्रायः सभी लोग जानते हैं कि शङ्कर के पास ‘तीन नेत्र’ थे । खामाबिक दो नेत्रों के अतिरिक्त एक विभिन्न नेत्र उनके तलाट में था । इसे वे गुप्त रखते थे । जब जनता में तमोगुण की वृद्धि होती थी, तब वे इसे प्रकट कर, इस से संहार का काम लेते थे । कामदेव के आक्रमण करने पर, उन्होंने इसी के बल से उसे दण्ड कर अपने ब्रह्मचर्य का संरक्षण किया था । इसी नेत्र के कारण दोनों ने उन्हें अपना गुरु मान लिया था, और असुर-समूह उनसे सदा भय-भीत रहता था । यह नेत्र उन्हें मिला कहाँ से था ? ब्रह्मचर्ययुक्त योग-साधन से ! यह तीसरा नेत्र क्या था ?—आत्मज्ञान था !

यदि तुम शङ्कर बनना चाहते हो, तो इस तृतीय नेत्र को प्राप्त करने का प्रयत्न करो । विना इसके तुम अपने मनो-विकारों