भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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त्रिनेत्र और सखीवनी-विद्या

का कदोपि नाश नहीं कर सकते। मनोविकारों के नष्ट होने से ही मनुष्य अपना तथा संसार का हित कर सकता है। त्रिनेत्र हो जाने पर समस्त दुर्गुणों को भी नष्ट किया जा सकता है। इस प्रलयङ्कारी नेत्र का बड़ा माहात्म्य है। इसी के प्राप्त हो जाने से शिव 'मृत्युञ्जय' भी बन गये थे। तुम भी कामनाशक मृत्युञ्जय बन सकते हो ! इधके वल से तुम्हारा अखण्ड ब्रह्मचर्य तप कभी भ्रष्ट नहीं हो सकता।

यह बात हम पहले कह आये हैं कि शुक्ल के पास 'सखीवनी-विद्या' थी। इसी के प्रताप से वे असुरों को जीवित कर देते थे। असुर लोग उन्हें आचार्य मानते थे। उन्होंने इसी के प्रयोग से कच नाम के विद्यार्थी को जीवित कर दिया था।

कच बृहस्पतिके पुत्र थे ये सन्नीवनी विद्या सीखने के लिये शुक्ल के पास गये और ब्रह्मचर्य से रह कर विद्या सीखने का निवेदन किया। यह बात असुरों को ज्ञात हुई। इस पर वे जले और कच को मार डाला। पर शुक्लाचार्य ने उन्हें पुनः जीवित कर दिया।

यह सखीवनी-विद्या क्या थी ? वीर्य-संरक्षण की प्रणाली थी। असुरों ने कई बार कच को मार डाला था। इसका यही अभिप्राय है कि उसे अपने संसर्ग से वीर्य-नाशक—व्यभिचारी बना डाला था। हम कह चुके हैं कि वीर्य-नाश ही मृत्यु है। इसलिये शुक्ल ने कच को वीर्य-रक्षा के उपाय बता कर, उसे सचेत कर दिया। वह पुनः सदाचार से रहने लगा। इसी सखीवनी-विद्या के पा जाने से कच ने देवयानी जैसी सुन्दरी का चिरस्कार अन्त में कर दिया था।

अब पाठक 'त्रिनेत्र' और 'सखीवनी-विद्या' के उपाख्यानों