भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य विद्वान

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का रहस्य समझ गये होंगे। ब्रह्मचर्य से रहने वाले सदाचारी को 'देव' और वीर्य-नाश करने वाले दुश्चरित्र को 'असुर' समझना चाहिए।

त्रिनेत्र प्राप्त होने से ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है और सखी-वनी-विद्या से वीर्य-नाश से बहारा होता है। जो ब्रह्मचारी हैं, वे तो मनोविकारों का नाश कर सुरक्षित रहते हैं और जो न्य-भिचारी हैं, वे ब्रह्मचर्य से रहने के लिये उपाय खोजते हैं। अत-एव प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह त्रिनेत्र और सखीवनी-विद्या—दोनों को प्राप्त करे। त्रिनेत्र 'आत्मज्ञान' और सखीवनी विद्या—'वीर्य-रक्षा-प्रणाली' है। इन दोनों की प्राप्ति से देव और असुर—दोनों प्रकार के मनुष्यों का बहारा निश्चित है।

२१—अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त

सर्वं वेदात्मसिध्यति । 'प्रमाणं परमं श्रुतिः ।'

( यमक्षत्रपुण मनु )

सब कुछ वेद से सिद्ध होता है। कारण यह है कि वेद में सभी प्रकार के विषयों का संग्रह है।

सब से बढ़ कर प्रमाण वेद है। जिस बात का समर्थन वेद में है, वह अन्य ग्रन्थ के प्रमाणों की उपेक्षा नहीं करता।

“इदम्राप्त्यनिष्टपरिहारयोरलाकिक मुपार्थयो वेदयति स.वेदः।”

( साम्प्रकार वायुणाचार्य )

जो इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट के नाश करने का संदुपाय बतावे, उसे वेद कहते हैं।

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