भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 380 में से

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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त

इस खण्ड में हम अनेक प्रकार के प्रमाणों और उदाहरणों से ब्रह्मचर्य का महत्व दिखला चुके हैं। अब हम इसे वेद में दिखलाना चाहते हैं। क्योंकि मानवो-सभ्यता के सर्व श्रेष्ठ ग्रन्थ वेद ही हैं।

ब्रह्मचर्य बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। वेद जैसे सार्वभौम ग्रन्थ में इसके आदर्शों की महिमा का वर्णन न होना अत्यन्त असम्भव है !

यों तो प्रायः सभी वैदिक ग्रन्थों में ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में कुछ न कुछ भाव प्रकट किया गया है, पर हमारे अथर्ववेद में तो एक सूक्त का सूक्त ही, इस महत्वपूर्ण विषय से परिपूर्ण है। इस सूक्त का नाम ही 'ब्रह्मचारी' या 'ब्रह्मचर्य-सूक्त' पढ़ गया है। इस सूक्त में सब २६ मन्त्र हैं। इनमें ब्रह्मचारी की महत्ता, कर्त्तव्यशीलता और व्यवहार-निष्ठा—ब्रह्मचर्य की महिमा, कार्यसिद्धि और व्यापकता, एवं आचार्य के धर्म, महत्त्व तथा उपदेश का वर्णन अलङ्कार-मयी भाषा में बड़े सार-गर्भित रूप से किया गया है। यह बड़े काम का है। यदि एक एक कर के भाव सहित सब मन्त्र कण्ठस्थ कर लिये जायें, तो बहुत ही लाभ पहुँच सकता है। पतदर्थ हम सम्पूर्ण सूक्त को अर्थ तथा भावार्थ सहित पाठकों के दिल की दृष्टि से लिख देना चाहते हैं।

आजकल वेदों का विज्ञान-युक्त अर्थ करने वाले बहुत ही कम लोग हैं। इसीलिये अन्गोल अर्थों से लोगों में केवल भ्रम फैल जाता है, और लाभ कुछ नहीं होता। वेदों की साधा अपौरुषेय है, इसलिये देश, काल और पात्र के अनुकूल एक ही श्रृंखा के कई अर्थ हो जाते हैं। पण्डितवर रामण, महीधर, सायण-

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