ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 83, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य-विज्ञान
८०
चार्य, शङ्कराचार्य और स्वामी दयानन्द—जितने भाष्यकार हुये हैं, प्रायः सर्वोंने अपने-अपने मन के अनुकूल अर्थ किया है। 'ऋग्वेद-भाष्य-भूमिका' में पुराने भाष्यों की अनर्थता और उनके भ्रमों का युक्ति-युक्त खण्डन किया गया है और यह बात सिद्ध की गई है कि वेद में विज्ञान-विरुद्ध अर्थ हैं ही नहीं।
हम इस ब्रह्मचर्य-सूक्त का वास्तविक अर्थ काशी के एक विद्वान्-वेदङ्ग-ब्राह्मण से सम्मन्ना चाहते थे, पर खेद है, वे इस कार्य में असमर्थ ज्ञात हुये। और उन्होंने यह भी कहा कि यहाँ की पण्डितमण्डली तो वही पुराना अर्थ करेगी। अतः हमने स्वयं परिश्रम कर, सुसङ्गत भावों के निकालने की चेष्टा की। और उसी पर संतोष किया, चन्हें पाठक स्वयं आगे देखेंगे :—
ब्रह्मचर्य-सूक्त
( १ )
ब्रह्मचारी षांख्यरति रोदसी उभे तस्मिन्देवाः सम्मनसो प्रवर्तत । स द्वाधार प्रथिवीं दिवञ्च स आचार्यं तपसा पिपत्ति ॥
( १ ) ब्रह्मचारी प्रथिवी और आकाश को वश में करता हुआ चलता है। ( २ ) उसमें देव लोग मन के साथ रहते हैं।
( ३ ) वह प्रथिवी और आकाश को धारण करता है और ( ४ ) वह आचार्य को तप से पूर्ण करता है।
( १ ) ब्रह्मचारी ऐहिक और पारलौकिक वस्तुतियों को अपने अधिकार में करने के लिये, सदैव उपयोग करता है।